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Saturday, January 28, 2017

सकरात के बात



 (ई रचना भोजपुरी संगम के जनवरी -२०१७  अंक में छपल बा )
गोड़ लागीं ए बाबा !कउड़ सेंकत रमेसर हाँक मरले । पंडित घरभरन मिसिर भोरे भोरे मुँह में दतुअन कचरत आ दायाँ हाथ में लोटा हिलावत चलल आवत रहन । दतुअन होठ आ दाँत के मिलल जुलल पगुरांव प अपने आप कब्बो दायाँ गाल त कब्बो बायाँ गाल फेरात रहे । थूक आवे त दाँत में दतुअन  के दबा के आगे के दू दाँत के फांक मुंहे पिच्च से थूक देस । कान पर जनेऊ के तीन फेरा देवे में स्वेटर आ गंजी एक ओरे से उचकत रहे ।
पंडित घरभरन मिसिरगाँव देहात में पुजाले । सतनराएन के कथा से लेके सप्तसती के जबानी घोंट के पी लेले बाड़ें । शुम्भ-निशुम्भ आ कुम्भ ना जाने कई तरह के बियाह के मंतर जानेलन । अइसन मनई से हर कोई आस राखेला कि ओकर समस्या के निदान त मिलिये जाई । अब उ भले पतरा देख के बतावस भा जतरा देख के... लोगवा त पुछबे करी । सांझे पुछी, बिहाने पुछी ... आते पुछी त जाते पुछी, कब्बो नहाते त कब्बो मर मैदान जातो पुछी । त बाबा घरभरन से काहे ना पुछी । लोग पुछल... लोग ??? अरे ना रमेसर पुछले हाँ । पुछले हाँ... अबहीं कहाँ... अबहीं त पुछे के सुरता बनवले हाँ ... पांवलग्गी आ उहो दूरे से । मुँहे से उचरले हाँ । आसीरबादो मिलल ह । मुँह के बायाँ ओर के दाँत से दतुअन दबा के... अपना से बाएँ तीन फर्लांग दूर पिच्च से थूकला के बाद ।  “...जै जै रमेसर बाबू । आबाद रहीं.... अहा हा ! आग तापत बानी !? इहो सिद्ध लोग के काम ह - धुनी रमावल आ पंचाग्नि तापल । रवा त पहिलहूँ के सिद्ध हईं । ना आगे नाथ ना पीछे पगहा... राउरे मरजाद बा सउंसे जगहा । कहीं... कुछ कहल चाहत बानी का ??”
ना ए बाबा, कहे के का बा... देवता मनई के भोरे-भोरे दर्शन भइलो त पुन्न ह ।
अहा हा हा... जीहीं, जीहीं । खूब कहनी... बाकी ए रमेसर बाबू हई मर मैदान के रास्ता रोक के दर्शन करे के ममिला गड़बड़ बुझाता ।
हा हा हा ... बाबा के बात । अब का कहीं ए बाबा... रवा अइसे त भेंटाईं ना । कब्बो फलनवा जजीमान किंहा छठीहार सतईसा त कब्बो चिलनवा जजीमान किंहा सराध । राउर त गोड़ में चकरी लागल रहेला । अब रवा से भेंट करे खातिर इहे नीक राह लउकल ह । जानते बानी गाँव देहात के लोग दिन में भले मत लउके बाकी साँझ बिहान सीवान ओरे भेंटा जाई । अब घर से नजदीक जवन सीवान ओनही पठान ।
त आज हमार सीवान छेंकाइल बा । खूब कहनी बाबू साहेब । रुकीं... अब हेतना उतजोग कइनी त राउरो समस्या सुनिए लिहल जाव । दू मिनट आउरी दम धरीं... आईं हई इनरा पर से तनी दू बाल्टी पानी के इंतजाम करीं... हाथ मलीं आ मुँह धोईं । मर मैदान के मुँहे त भगवान के नामो ना लेवे के... रवा कहीं जतरा पतरा के बात करब त दिक्कते होई ।
रमेसर उठ के दू बाल्टी पानी के बेवस्था कइलन ।  जै जै.. बड़ा गरम पानी बा एह इनरा के ।
नहइबो करब का ए बाबा ?”
अरे ना ना... बड़ी जाड़ बा हो... घरही नहाइब । अबही त मंतर स्नाने से काम चली... दू दिन बाद सकरात आवता । बनारस के प्रस्थान होई, ओहिजे गंगा जी में भर जाड़ के स्नान के फल लेहब ।
सकरात गुने त हमहूँ अइनी हाँ... अब रवा से का छुपल बा । सकरात पर कुछ शंका समाधान त रवे नू कर सकीले ।
लीं...भल कहनी । सकरात पर पुछब आ उहो सूखे सूखे । रवा सोझे हाथ मुँह धोके बइठल बानी आ खाये पीएवाला परब पर बतकही कइल चाहत बानी .... ई ना होई । मंगाईं पाव भर चूड़ा, गुड़ आ चार पाँच गो लाई-तिलवा तब नू गेयान के गठरी खुली ।
ए बबुआ दुर्गेश, तनी हाल दे घरे धाव.... माई से सेर भर चूड़ा, गुड़ लाई तिलवा मांग के लाव... बाबा के सीधा देवे के बा । भाग के जा आ धउड़ के आव त” –रमेसर आपन लईका के कहलें । ए बाबा रवो शुरू करीं, पनपियाव त आवते बा...
हं हं काहे ना... तनी जगह बनायीं । जाड़ में कउड़ के आग से बड़ सुख का होई... हाँ त रमेसर बाबू , का पुछे के रहल ह ?”
बाबा, एगो शंका रहल ह, सकरात में दहीये-चूड़ा आ खिचड़ी काहे ?”
जै जै... बड़ा नीक पुछनी । माने कोतवाल से कोतवाली के हाल पुछल जाला । सब भेद खुल जाई त हमरा अगिला बेर से ना चूड़ा भेंटाई ना लाई तिलवा के नेवान होई ।
हा हा हा... रवो नू , बतिया के कहाँ से कहाँ ले जाइले । शंका एह से आइल ह कि केहू एकरा के खिचड़ी कहेला, कहीं सकरात, कहीं पोंगल आ सब जगहा लगभग एके लेखा विध वेव्हार तिल गुड़ के... खिचड़ी के... इहे बड़ा कन्फूजन हो गइल कि ई काहे आ कइसे... आ अइसे त कबसे ?”
लीं... राउर शंका त लमहर राह लेता । एगो पुछब त दोसर निकली । दोसर त तिसर ... रुकीं बतावत बानी... लीं हई देखीं पनपियाव आ गइल । रवो सभे लीहीं । अब बात कुछ गंभीर होई त मुँह चलत रहे ।
हं त रवा सभे जानते होखब हमनी के पुरनिया के... बड़का वैज्ञानिक सोच रहे लोग के । रीत रिवाज आ विध वेव्हार से समाज के अस बांध के रखलस कि देह दशा तनिको ना बावें होई ना दहीने । जेतना लोक परब बनावल गइल उ उहे लोग के देन ह । प्रकृति, समय आ भौगोलिक स्थिति के सटीक विश्लेषण जेतना पुरुखा लोग कह गइल बा ओतना आज के वैज्ञानिको जुग में अंदाज लगावल संभव नईखे । माटी, पानी, हवा, आकास, धूप, छाँव जईसन प्राकृतिक चीजो वैज्ञानिक यंत्र रहे ।
हाँबतिया त साँच क़हत बानी... का, कब आ कइसे के वेव्हार ई त सांचहूँ बतावल बा... त फेर आगे कहीं ।
देख ! भारत के भौगोलिक स्थित एक नइखे । समशीतोष्ण  प्रदेश कहाला । कहीं कंपकपात जाड़ त कहीं चिलचिलात गरमी । कहीं लहलहात खेत, कहीं जंगल त कहीं पहाड़ आ पठार । कुछ प्रदेश में नदी नाला आहर पोखर के जाल त कहीं सालों भर सुखाड़ । अब अईसन परिस्थिति में कवनो लोकपरब मनावे के तरीका आ समय बिलकुल अलग होखबे करी ।  पूरा भारत में जगह आ सुविधा के अनुसार लोक-परब के मनावे के विधि आ समय अलग बा । बाकी सभे के पाछे एके उद्देश्य इहे बा  कि मय समाज एह परब में गुंथा जाव । ना बड़-ना छोट, ना छूत- ना अछूत, एह लोक-परब में सब भेव मिट जाव ।  लोक परब के अबूझ संसार के रीति रिवाज आ विधि के पाछे जवन पुरुखा पुरनिया के वैज्ञानिक सोच छुपल बा उ धेयान देवे योग्य बा ।
साँच बात”- रमेसर के साथे ओहिजा बइठल दू जाना हुंकारी  भरले ।
जाड़ के मौसम में शरीर के ज्यादा ऊर्जा के जरुरत पड़ेला । देखते बाड़ऽ कि बगैर एह आग के तापले देह के हाड़ जरनेटर लेखा हिलत बा । ठंढा जगहा में  लोग खूब माँस मछरी खाला कि देह गरम रहो । हमनी के का मर मसाल, मकरध्वज आ चवनप्रास । एतना तक त ठीक बा कि खाए पिये से गर्मी आ जाला बाकी एकरा साथे महनतों के जरूरत पड़ेला । बाकी जाड़ा के मौसम में लोग ऊर्जा के अभाव में आलस्य के कोरा में बइठल रहेले । अब बदलत प्रकृति के अनुसार हरेक जीव जन्तु, पेड़ पौधा अपना के ढाल लेला आ प्रकृति के साथ समरस हो जाला बाकि मनुष्य के आपन प्रकृति बा । समस्त संसार पे विजय के चाह राखेवाला मनुष्य अपना के प्रकृति के साथ ना बदलेला आ आपन नुकसान करेला ।
हाँ बाबाबतिया ठीक कहत बानी । हमरो मन करत रहता कि खरिहान में खटहुल में जाके पुअरा के गरम बिछावना पे दिन भर चद्दर तान के सुतीं । बाकी जानते बानी गाय गरु , खेती बाड़ी के काम छोड़ के नींद लागो । चवनपरास से इयाद पड़ल ... अबकी सुदेशन वैद का जाने चवनपरास बनवलन कि ना... पिछला साल त बाजार से लेनी त बुझात रहे कि सकरकंद के हलुआ होखे । सुदेशन वैद के बनावल एक चमच खाये त देह पर से सुटर शाल सब उतार जाय...”- मड़ई जादो कउड़ के आग उटकेरत कहलन ।
अरे मरदे दम धरऽ... तहरा के सुनीं कि बाबा के”- रमेसर खिसियइलन । हाँ त रवा कहत रहीं बाबा... बड़ा नीक जानकारी बा
अरे ना हो, मड़ई ठीके इयाद करइलन ह सुदेशन वैद के... बड़ा विद्वान आदमी उहो... ढेर बात उनको से होला । उहे कहत रहन कि वैदई में मानल जाला कि शरीर के छलावे में तीन चीज के ईंधन काम करेला । आ एह तीनों के तनिका से हेरफेर से शरीर मे रोग बेआधी हो जाला । वैद जी शरीर में वात (वायु) , पित्त आ कफ रहेला आ एकरे के त्रिदोष कहत रहन । इहो बतावत रहन दोष के प्रकृति के अनुसार ही खानपान आ उपचार में बदलाव करल जाला । माने जइसन देवता ओइसन पूजा । अब सुनऽ एह सकरात के हाल... उहे वैद जी के भेद खोलल ह । आसीन (आश्विन), कार्तिक महिना में पित्त के प्रकोप ज्यादा होला । शरीर के भीतरियो आग बा जावना के पित्त कहाला आ एकर प्रकृति अमलीय ह, जे खाना पचावे के काम में आवेला । बाकी जब एह आग के दंवक अपना मान से तेज हो जाला  त आंत के नुकसान पहुंचावे ला । पित्त के प्रकोप से शरीर में जलन, पेटदर्द, उल्टी, पेट के दोसरो रोग जनम लेला । आ एह पित्त के प्रकोप तब आउरी बढ़ जाला जब ठंढ भगावे के फेरा में लोग अनाप-सनाप चीज खायेला । तेज मसाला, गरम पेय, शराब आ मांसाहारो एक बड़ा कारण बा पित्त प्रकोप के । आ एह तरह के खान पान के प्रयोग बहुत पहिले से कर रहल बा । अब एह शारीरिक पित्त के शांति पूस आ माघ के सकरात के समय करल जाला ।
वाह बाबा, हम त जानत रहीं कि रवा खाली मंतरे जानीले... रवा त हेतना निमन से वैदयी के बातो बतावत बानी ।
अरे इ सब अनुभव के बात ह । लोग से जाने सीखे ले मिलेला । त कहत रहीं कि मकर सकरात के दिन नया धान के चूड़ा (चीवड़ा, पोहा), दही के साथे नया फसल के गुड़, तिल के खाये के प्रथा सगरे बा । अब सुनऽ आउरी विज्ञान के बात । पुरनिया सब जवन खोज कइले नयका लोग अब खोजता । सोचऽ घर के नाली जाम होला त का कइल जाला?”
फराठी भा लग्गी से गाद आ कचड़ा के निकालल जाला भा आगे ठेल दियाला कि पाछे के पानी निकल जाव ।”-रमेसर कहले ।
चाबस बाबू साहेब... हम एही से नू कहिला कि रवा सिद्ध हईं । बात के कोर पकड़ के सीधे जड़ तक पहुंचीले । इहे चीज त पेटवो खातिर कइल जाला । अब पेट में लग्गी ना नू कोंचब.... त एकरा खातिर अइसन वेवस्था कइल गइल कि मय जमा खर्चा बिना हिंग फिटकिरी के निकल जाव । हमनी के खेतिहर समाज, एही प्रकृति से उपाय लेलस । हई चूड़ा के गुण जानते बाड़... पाव भर खाइब त कुछ देर में सेर भर खइला लेखा लागि । पानी मिली त पातर सुखल चूड़ा फूल के आपन औकात से बेसी हो जाला । त पेट के आंत में सटल जेतना गंदा पदारथ बा ओकरा के चूड़ा सोख ली । दही के गुण त जानते बाड़ कि पेट के निरोग रखेला । आ साथे साथ गुड़ पेट के अग्नि के ताप के दूर करेला ।
वाह, ई त सेतिहा के लाख रोपेया बराबर बात बतवनी । बाकी तिल-गुड़ , तिलकुट लाई काहे ?”
अरे ई त हमरो न मालूम रहे । वैद जी कहत रहन कि भुंजल तिल आ गुड़ से कब्ज ठीक हो जाला । अब पुरखा पुरनिया लोग ई जानत होई तबे सकरात के पेट सफाई के पूरा इंतजाम एके साथे कर देले रहे ।
सही कहत बानी बाबा... पुरनिया लोग हमनी से जादे विद्वान रहे । हरेक चीज के उपाय सेतिहे आ सहजे बता देलस लोग...
अरे आगे सुनऽ ... दिन में चूड़ा-दही से पेट के जब मल के निकास हो गइल  त रात के खिचड़ी... कि जड़ी पच जाये आ पेट के आरामों मिल जाये ।
ए बाबा  राउर बहुत बहुत धन्यवाद एह शंका दूर करे खातिर । बाकी एगो आउर सहजे प्रश्न उठट बा कि खाये पिये से त बुझा गइल कि शरीर  के लाभ मिली बाकी हई तिलंगी (पतंग) काहे  उड़ावल जाला ?”
हा हा हा... कहनि हाँ नू कि आदमी के स्वभाव ह आराम करे के... पेट भइल भारी त अब का लदब व्यापारी । माने अघाइल बैला के हौ ... पेट भरल ना कि देह हाथ सोझ करे आ आराम के फिकीर । त पतंगबाजी से माघ के गुनगुना घाम देह में लागो आ खेलत कूदते चूड़ा के भारीपन दूर हो जाय त का हरज ।
वाह, माने आम के आम गुठली के दाम वाला बात
अरे अतने ना, आउर सुनऽ...  एह पतंगबाजी में योग साधना घुसल बा । भारतीय साधना पद्धति में बिन्दु साधना एगो महत्वपूर्ण अंग ह । एह साधना में एक बिन्दु पे धेयान केन्द्रित कराल जाला । आँख, बुद्धि तेज करे के सबसे बढ़िया उपाय लईकन के पतंगबाजी ह । पतंग के हरेक लोच आ कलाबाजी के साथ मन आ शरीर के मेल साधना के अनूठा रूप ह । सकरात के दिन के चूड़ा दही के भारी भोजन के खेल कूद में पाच जाय आ साथे एक साधना हो जाये , एही सोच के साथे सकरात के पतंगबाजी जोड़ दियाईल ।
बाबा त एह में पूजा पाठ कवना काम के ?”
लऽ... लगल नू आपन बुद्धि लगावे । हम कहत रहीं  नू कि भेद जानते हमार दान दक्षिणा पर आफत हो जाई आ तू अबहियें ओकर झलक देखावे लगल ।
ना बाबा, राउर सीधा-पानी त चलते रही, बस इहे अंतिम शंका रहल ह । जब एतना बता देनी त इहों बता दीं ।

अच्छा त इहों सुन ल... सकरात खाली लोकपरब ना ह । ई पुरखन के वैज्ञानिक सोच से उपजल, मौसम के संधिकाल में शरीर के शोधे के परब ह । खात पियत खेलत कुदत एगो बड़ स्वास्थ्य रक्षा के उतजोग हो जाये आ एकरा में हिंग ना फिटकरी खाली आनंदे बरसे त इहे नू लोकपरब के असली माने कहाई । सुरूज साक्षात ऊर्जा के प्रतीक हवें, अब राशि ग्रहचाल से उनकर स्थिति जवन होखे, बाकी एह परब में उनको के पूजा करल जाला । एह घरी सब नया अन्न आवेला त हरेक खेतिहर के ई कर्तव्य होला कि एकरा खातिर प्रकृतियो के धन्यवाद देवे । अब एह में प्रकृति के इयाद कइल, पुरखा पुरनिया के इयाद कइल आपन कुल खानदान के इष्ट, गाँव के देवता के पूजा कइल त कवनों जबून काम बा ना... बाकी के सब कथा कहानी त हमनी के जजिमनिका चलावे खातिर ह । ल इहे... बुझाता नौ दस बज गइल । ईंहा बात करे के फेर में ढेर कुबेर हो गइल । रमेसर बाबू, आगे से अइसे जन रोकब... । चलीं जै जै  सभे के....
*****

Sunday, November 15, 2015

छठी मायी

Krittika
http://www.astrovikalp.com/nakshatrastar-3-krittika-2640-mesha-1000-vrishabha/

गोड़ लागीं ए बाबा, कहंवा लपकत जात बानी?
हमनी किंहा, पंडी जी लोग के परनामो कईला के अजिबे ढंग बा । अब  “गोड़ लागीं ए बाबा...” से त इहे नु कहाई ।एक मने बाबा के गोड़ लगाई आ दोसरका मने बाबा से गोड़ लगवायीं  ।अब गाँव में एह तरह के बतकही चलत रहेला ...
हमार गाँव के नाव ह –पवना...  आ एह गाँव में एगो गान्ही चउक बा । पता ना गान्ही बाबा एहिजा कईसे पहुच गईले... इतिहास में त नईखे,  बाकी इ गान्हिये चउक कहाला । एहिजा मय गाँव के स्थिराह लोग मुफुत के मिठाई-जिलेबी  के गन्ह (गंध) लेवे खातिर जुटल रही । आ आवत जात लोगन के टोकत रही । इहे बड़का मनोरंजन रहे... एही मनोरंजन में आज हम धरयिनी ।
एक जाना कहले- ए बाबा, सोहराई (दिवाली) बितल आ अब छठ आईल ।
बाकी एह छठे के सोच के हमनी के बुद्धि भरमायिल...
सुरुज बाबा मरद हवें... चान-सुरुज सभे आकासे में रहेले,  बाकी इ छठी मईया कवन देवता हई ।इनकर भेद त रउरे बुझायीं ।
बड़ फेर भईल ए भाई... इ बाबूसाहेब लोग के आज बढ़िया मसाला भेंटाइल...
कहनी- ए बाबु साहेब ! काल भोरे-भोरे, नहा धोकर हमारे दुआर पे आइये ।सीधा आ दक्षिणा जरुर रखियेगा... पान-सोपाड़ी आ छुट्टा फुल के साथे ।
उहो बाबूसाहेब उजबक... होत फजिराहे नहा धो के  आ गईले ।
कहनी की – सुनी कथा त सूना देब बाकी एह कथा से पहिले इहो सुनी –
“कईली बरतिया तोहार ए छठी मईया
तोहार महिमा अपार, ए छठी मईया”
पकड़ी के फेंड़ (पेड़) पर भोंभा बाजत रहे ।हमनी के चिहायीं जा, एह भोंभवा में से कईसे आवाज आवत बा !!! शहनाई के जईसे एकरो रूप बा , बाकी तनी बड़हने बा... शहनाई त मुंह से फूंक के बजावल जाला ।अब एह भोंभा के पोंछ पे बटखरा जईसन कुछ बाँधल बा ।एहिजा के फूँकत बा !!?? गांवे एगो बाबूसाहेब के बरियात आईल रहे ।दुआर पे एक कोना में चौकी पे दू जाना शहनाई आ एगो तबला बजावे बयिठले ।लायिकायीं के अकिल, एगो आगलगावन चाचा लईकन के उस्का देलें की शहनाईवाला के सोझा अचार खा स ।हमनियों के चांगड़... आम के खटाई लगनी जा चाटे ।अब उ शहनाई वाला फूंक त बरियार मारे बाकी आवाज आवे फें फें... भईल शिकायत ।लउर लेके एक जाना हमनी पे टूटले ... बाकी हमनी के अन्हिया बैताल हो गईनी जा ।
उहे अमवा के खटईया वाला खेल एहो भोंभा पे करीं जा, बाकी एकरा सुर में कवनो विघिन ना पड़े... एके रागे गावत जाए ।भोंभवा के पीछे देखीं जा की कवनो मरद मेहरारू घुसल त नईखन...
लीं बात शुरू कईनी ह छठी माई के गीत से भोंभा के बखाने लगनी ।आ रउरो मुंह बा के सुनत (पढ़त) जात बानी... टोकनी ह काहे न !!??...
अच्छा त अब ध्यान देब... हम भटकीं-त टोकब... कुछो ना बुझीं त – रोकब !!!
त एक बार जयकार लगायीं कि - हे ! छठी माई किरिपा बरसायीं ।
सुमीर लीं भोले बैजनाथ के नांव... अमुक क्षेत्रे, अमुक गाँव... ले लीं आपन गोत्र-पित्र के नाव
एह गोबर गणेश पे पान फुल सोपाड़ी चढ़ाईं... संगे सवा रोपेया दक्षिणा ।
त बात करत रहीं एह छठी माई के... लयिकायीं से ईगो सवाल कुलबुलात रहे ।पूजा होत बा सुरुज बाबा के त इ छठी माई के हई !? सुरुज बाबा त रथ पे बाड़े, जवना के सात गो घोडा खींचेला... इ छठी माई कहीं लउकत नईखी ।इहे सवाल हम आपन बाबा से पूछनी ।हमार वेदव्यास उन्हें के... बाबा बतवनी हमरा के जवन कथा- उहे हमरा मुखे सुनी –
कथा बा शिव पुराण के... हँ हँ हँ ... उहे भोले बैजनाथ के कथा बा ।
उनकर छोट लईका के नाव रहे स्कन्द । लयिकायींयें से बड़ चंचल ... कोरे में रहन बाकी उत्पात के कमी ना रहे ।स्कन्द के माई रही गउरा... गईली एक दिन नदी के कछारे नहाए ।
आ एह लईका के किनारे कपड़ा में लपेटी छोड़ गईली ।लईका रहे उत्पाती एक ओरे लुढ़के लागल ।किनारहीं  नरकट के झुरमुट रहे.. लईका ओही में घुस गईल... ठंढा छांह मिलल त घोर नींद घेरलस ।
ओने गउरा के लईका ना मिलल त रोवत पीटत घरे गईली की कवनो शेर बाघ भा सोंस घड़ियाल लईका ले गईल ।
घरी भ बीतल होई की छव गो सुनार मुनर राजकुमारी आकास से उतरली आ नहाये लगली...
लईका के भूख लागल त जागल आ रोये लागल ।
लईका के रोवाई सुन के इ छौ जानी नरकट के झुरमुट म गईली, त देखत का बाड़ी- बड़ सुनर लईका, भूखे बिलखत बा ।
एह लोग के दया आईल त सभे जानी आपन आपन दूध एह लईका के पिअवलस ।लईका चुप लगा गईल ।
बोलीं – जै भोलानाथ !
इ छौ बहिन लोग कृतिका नक्षत्र के तारा लोग रहे, इनका लोग के भी कृतिका ही कहल जाला  ।कृतिका नक्षत्र , सुरुज भगवान के सबसे नजीक होला । इ लोग सुरुज भगवान के प्रार्थना कईल कि अब इ लईका हमनी के लईका ह ।अब रउरा एकरा के आशीर्वाद दिहीं ।
http://www.bibliotecapleyades.net/universo/passage_change.htm
सुरुज बाबा बड़ा प्रसन्न... लईका के बुद्धि-विद्या आ अमर होखे के वरदान देले ।
ध्यान लगा के देखले त सभे कुछ मालूम हो गईल कि , इ लईका भोला नाथ के ह...
कहले इनकर नाव त स्कन्द ह बाकी तोहर लोग के लईका भईला से अब इनकर नाव कार्तिकेय होयी ।
बोलीं – जै भोलानाथ !
त अब गउरा के साथे इ लईका के छौ माई आउर भेटा गईली । इहे छठी माई हई ।
त परेम से बोलीं – जै हो छठी माई । जै हो सुरुज बाबा...
जईसे छठी माई एह लईका के लालन पालन करके ओकर भूख मेटवली ।ओइसहीं हे ! छठी माई हमनियों के लईका खातिर सुरुज बाबा से वरदान मांग दीं ।हमनियो के लईकन के बरदान दीं ।

लीं कथा ख़तम हो गईल । हमार दक्षिणवा निकालीं ।

Sunday, October 4, 2015

जीउतिया: बलिदानी जीमूतवाहन के ईयाद के परब

 
 [ एह लेख के प्रकाशन भोजपुरी साहित्य के ई पत्रिका आखर के सितंबर 2015 में हो चुकल बा पत्रिका पढे खाति आखर के वेबसाइट www.aakhar.com पे जाईं ] 

जीउतिया: बलिदानी जीमूतवाहन के ईयाद के परब
ए अरियार ! का बरियार !!
बैठे के दे देबो सिंहासन पाठ
राम जी से कहिह
फलनवा के माई भुखल बाड़ी जिउतिया ......
इहे कह के पीढ़ा के जवना पे जीउत महाराज बिराजेलें पाँच बार उठावल बईठावल जाला ।  ई कवनों बेद पुराण के मंतर ना ह । लोक संस्कृति में मुंहे मुंहे फैलल लबेद ह । जवना में कवनों विशेष लिखित विध ना होखे । बरत त्योहार के विध के एक पीढ़ी से दोसर पीढ़ी तक, एक समाज से दोसर समाज तक देखादेखी आ मुंह से कहल बातन से ही आगे बढ़ेला । हरेक परब के अलग विध, व्यवहार आ मान्यता आ सभे अलिखित । चिल्हो- सियारो के कथा, बहुला के कथा आ नाजने केतना लोक कथा । आज के वैज्ञानिक जुग में एह तरह के हरेक परब के बुद्धिजीवी लोग नकार दिही । बाकी कवनों निर्णय लेवे से पहिले लोक परब आ ओकर पाछे के छुपल गूढ रहस्य के जानल बहुत जरूरी बा । काहे एह परब के लोक व्यवहार में एतना प्रचलित करल गईल ? काहे लोगन के धरम के भाय देखा के एह परब के मनावे खाति बाध्य कर दिहल गईल । अयीसने कुछ पहलू के छुवत एह लेख के माध्यम से पढ़ीं जीउतिया जईसन लोक परब के बारे में ।
हमनी के सामाजिकता के मजबूत करे में लोक व्यवहार, संस्कार, संस्कृति आ परब-त्यौहार के विशेष महत्व बा । सभे परब-त्यौहार के पाछे पुरखन के वैज्ञानिक सोच जेहमें शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य के बढ़ावे के, पारिवारिक आ सामाजिक ढांचा के मजबूत करे के गूढ आ गहीर बात छुपल बा । अईसन परब-त्यौहार में तीज आ जीउतिया  के नाम सबसे ऊपर बा ।
जीउतिया भा जीवित्पुत्रिका व्रत के माने ह कि संतान के उमीर- अर्दोआय  बढ़ावे खाति कइल जाला । जेकर संतान ना होखे उहो मेहरारू लोग एह बरत के करेली । जीउतिया आश्विन महिना के अनहरिया (कृष्णपक्ष) के अष्टमी के मुख्य रूप से भोजपुरी बहुल इलाका पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार आ मिथिलाञ्चल में मनावल जाला ।
जीउतिया के कथा
जीउतिया के प्रचलित कथा लोग एह बरत के दिन पढे ला । कथा में राजा जीमूतवाहन के आपन प्रजा के प्राणरक्षा में आपन प्राण के आहुती देवे के आ फेर प्राण हरेवाला से लमहर उमीर के आशीर्वाद पावे के चर्चा बा । कथा शंकर जी के माध्यम से पार्वती जी के सुनावल जाता । हिमालय क्षेत्र में एगो गंधर्व के राज्य रहे । राजा जीमूतकेतु बहुते दयालु रहलें हमेशा धरम करम में लागल रहस , एहसे जनता स्वछंद हो गईल रहे आ एक दिन महल के घेर लेलस । राजा आपन राज आपन गोत्र के लोग के सौंप के आपन बेटा जीमूतवाहन के साथे मलय पहाड़ पे चल गईले । एक एक रोज जीमूतवाहन घुमत रहले त एगो पहाड़ के चोटी पे हड्डी के ढेर देखाई पड़ल । पुछला से मालूम पड़ल की ई सब गरुड़ के करामात ह । आगे बढ़ले त एगो बूढ़ी रोवत रहली । पुछलें त उ कहली-
“हम नागलोक के रहेवाला हईं । ई जेतना हड्डी देखत बाड़s उ सब नाग के हड्डी ह । गरुड़ से करार बा कि रोज एगो नाग उनकर भोजन बनी । आ जेह दिन गरुड़ के भोजन ना मिली उ सभ नाग के एके बेर खतम कर दी । आज हमार बेटा शंखचूड़ के बारी बा । एही से रोवत बानी , एहिजा गरुड़ से गोहार लगावे खाति आइल बानी ।“
जीमूतवाहन ओह बुढ़िया के समझवले- “हम तहार बेटा के जगह पे जाईब” ।
आ लाल कपड़ा में अपना के लपेट के बलि स्थान पे सुत गईले । गरुड़ आईले आ लाल कपड़ा में लपेटाईल जीमूतवाहन के पंजा में दबा के उड़ गईले आ पहाड़ पे ले जाके बईठ गईले ।
गरुड़ के आश्चर्य भईल कि पंजा में दबोचला के बादो तनिको आह-उह के आवाज ना आइल । उ लाल कपड़ा हटा के देखले त जीमूतवाहन रहलें । उनकर परिचय पुछले त जीमूतवाहन सब किस्सा सुना दिहले । गरुड़ उनकर बहादुरी अवरू दोसरा के प्राण-रक्षा खाति आपन बलिदान देवे के हिम्मत से बहुत प्रभावित भईले । खुश होके आशीर्वाद में जीवन दान दिहले आ आगे से नाग के बलि लेवे से मुक्त कईले । जीमूतवाहन के अनुरोध पे जेतना नाग मरल रहले सब के जीवन वापस मंगले । गरुड़ प्रसन्न भईले, सभ नागन के प्राण लवटवले । जीमूतवाहन के राजपाट भी वापस आवे के आशीर्वाद दिहले । एह तरी जीमूतवाहन के प्रयास से नाग-वंश के रक्षा भईल आ तबे से बेटा के रक्षा खाति  जीमूतवाहन के पूजा के चलन शुरू हो गईल।
जीमूतवाहन :  जातक कथा के नायक से कुलदेवता बने तक
बौद्ध धर्म में भगवान बुद्ध के आदेश बा – “चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय” ।
भारतीय समाज में बहुजन के अर्थ होला सामान्य वर्ग चाहे उ गांव के रहेवाला होखे भा शहर के । एह सामान्य वर्ग में आपन बात आ उपदेश के पहुंचावे खाति लोक कथा आ उपमा के सहारा लिहल गइल । आ इ सब लोक कथा के माध्यम से लोग आपन भाषा (सकाय निरुत्तिया) में उपदेश के इयाद राखे एकर छूट रहे । बौद्ध धर्म के एह शैली के कारण बौद्ध साहित्य में अनेक कथा के समावेश भईल । भगवान बुद्ध से लेके बाद के चौरासी सिद्ध लोग तक अनेकानेक पात्र के रचना भईल आ ओसे जुडल छोट-बड़ कथा विकसित भईल । एह सब कथा के जातक कथा कहल जाला । आ एह जातक कथा से लगभग हर परंपरा आ धर्म प्रभावित भईल । जातक कथा के अलग अलग रूप स्थान आ समय के अनुसार परिवर्तित आ विकसित भईल । संस्कृत ग्रंथ बृहत्कथा में बैताल पच्चीसी के कथा ( 16वीं कहानी) आइल बा । बृहत्कथा के रचना 495 ई० पूर्व में राजा सातवाहन के मंत्री गुणाढ्य कईले रहन । बुद्ध के काल भी 563 ई० पूर्व से लेके 483 ई० पूर्व तक के ही बा । एह से बृहत्कथा में जातक कथा के समावेश बा । बृहत्कथा के भाषा प्राकृत रहे आउर एह किताब में लगभग 7 लाख छंद रहे । कश्मीर के कवि सोमदेव भट्ट एह किताब के संस्कृत में अनुवाद कईले आ नाम दिहले “कथासरित्सागर” । “वेताल पन्चविन्शति” यानी बेताल पच्चीसी “कथा सरित सागर” के ही भाग ह । बेताल पच्चीसी  के कथा के बहुत भाषा में अनुवाद भईल । ई कहानी खाली दिल बहलाव खाति ना रहे, एकर जातक कथा में जीवन के सार्थक करे के अनेक गहीर बात कहल गइल रहे ।
सोलहवीं कहानी में जीमूतवाहन के कथा बा । कथा में जीमूतवाहन के महान आत्मा, महापुरुष बनावल गइल । एह पात्र के महानता से प्रभावित मगध, मिथिला, बंगाल, उड़ीसा तक के लोग अपना के एह पात्र से जोड़ लिहले । जीमूतवाहन एक जगह के ना रह गईले । जातक कथा से निकल के धर्म आडंबर रहित लोकधर्म आ लोकपरब के देवता बन गईले । समाज के उच्च वर्ग से लेके दलित वर्ग तक ले पुजल गईले । सामाजिक समन्वय के जवन स्थापना जीमूतवाहन से भईल उ कवनों आउर कथा आ पात्र में ना लउके । मगध  के महादलित जाति “भुईयाँ” अपना के जीमूतवाहन से अधिका जोड़लस । सामाजिक रूप से दलित आ बहिस्कृत एह समाज के छूआछूत के बंधन में बान्ह के परब त्योहार, रीत-रिवाज में भी कवनों स्थान ना दिहल गइल रहे । महादलित एह जाति के जीमूतवाहन में एगो उद्धारकर्ता आ एगो अईसन देवता के रूप लउकल जेकरा के अपनावे में कवनों रोक ना रहे । भुईयाँ जाति जीमूतवाहन के आपन कुलदेव बना लेले । जीमूतवाहन के आपन प्राण के आहुती देवे के पुण्यतिथि के आपन कुलपर्व घोसीत कईलस । आ जीमूतवाहन के पुनर्जीवित भईला के खुशी में लगभग एक हफ्ता तक उत्सव मनावे के विधान कईलस । अब दलित जातियन के उत्सव पूजा पाठ के कवनों जानकारी त रहे ना, त लोक श्रुति के आधार पे आपन विध बना लिहले ।
बरत करे के लोकाचार
बरत से पहिले नेहाय खाय के विधि लगभग हरेक लोक परब में बा । सांसारिक करम से अपना के मुक्त करके शरीर आ आत्मा के साफ सफाई के दिन ताकि बरत में शुद्धि रह सके । बेटा बेटी से खानदान भरल रहे एह सोच के नेहान खाय के दिन अयीसने चीज खाये के विध बनावल गइल । मड़ुआ (रागी) के आटा के रोटी, सतपुतिया के तरकारी आ नोनी के साग । मड़ुआ के आटा खूब पसरेला, नोनी के साग आ सतपुतिया के लत्तर के साथे भी इहे बात बा, एगो लत्तर मय खेत के छाप लेवेला । खेतिहर उच्चवर्ग त शाक भाजी से शाकाहार कर ली बाकी दलित पिछड़ल वर्ग जेकरा भी एको धूर जमीन ना उ का खाई ? कुछ प्रदेश में मछली के शाकाहार मानल जाला । मछली के भेद ह सिधरी आ पोठीया । छोट मछरी जवन खूब अंडा देवेले आ आपन संख्या विस्तार करेले । कुछ जगह झींगा मछरी भी लोग एही क्रम में मानेला । त बरत के दू दिन  पहिले से ही मय गबड़ा- गड़ही, नाहर –पोखर ऊबिछ के मछरी मरायी आ नेहाय खाय के दिन एकरे सेवन होला ।
नेहाय खाय के दिन चूल्हा चौकी पबितर करके ओठगन ( आटा के ठेकुआ जे लगभग एक हथेली के बराबर होला) बनी। जेतना लईका-लईकी, ओतने ओठगन । ई ओठगन तनी कडक होला, मानिता बा की एह ओठगन के खईला से एकरे लेखा देह बरियार होई ।
होत पराते, किरीन फूटे से बहुत पहिले मय मेहरारू लोग उठी आ इहे ओठगन से सरगही करी । सरगहीयों के विधान बा । दू टूकी ओठगन चिल्हो आ सियारो के नाम पे घर के छान्ह छत पे फेंकाई की उहो लोग खा लेस । अब चील आ सियार एह बरत में कैसे अईलें एकर कवनों प्रमाण नईखे । सरगही के बाद पूरा 24 घंटा खाति निर्जला बरत शुरू होला । बरत के दिन साँझ के मय मेहरारू लोग एक जगहा एकट्ठा होके पुजा करी । एह लोक परब आ जातक कथा के बढ़त प्रभाव ही रहे की बाद में जीवितपुत्रिका व्रत कथा गढ़ दिहल गइल । शंकर भगवान आ पार्वती माई के बीच संवाद करा दिहल गईल कि जिउतिया के दिन जीमूतवाहन के पुजा करे के चाहीं । दान धरम के  बाकी एह पूजा में से लोक संस्कृति आ विधि के अलग ना करल जा सकल । पीढ़ा पे माटी के चिल्हो सियारो बना के सिंदूर चढ़ावल, नेनुआ (तुरयी) के पत्ता पे जीउतिया के स्थापन कर के पीढ़ा के उठावल-बईठावल कवनों वेद में लिखल ना मिली । लोक संस्कृति के परब ह , दू-चार गीत गंगा मायी के,  दू-चार गीत ब्रह्म  बाबा के आ हो गइल पूजा । पुजा के बाद लोग जीउतिया के आपन बेटा बेटी के पहिराई । जीउतिया बनवाए में भी सामाजिक विषमता रहे । सम्पन्न लोग बेटा खाति  सोना के आ बेटी खाति चांदी के जीउतिया बनवावत रहे । बाकी जे निर्धन रहे उ एगो धागा से भी काम चला लेत रहे ।
बरत के दोसरा दिन पारन कइल जाला बरत के तूड़े खाति । एह दिन बूँट के अंकुरी, मड़ुआ के दाना आ नोनी के कच्चा साग लिलल जाला । बूँट लगभग हर जगहा मिलेला एह से बरत के दुसरका दिन बूँट आ बेसन के विशेष कढ़ीनुमा व्यंजन बनेला । भोजपुर क्षेत्र में एकरा के टोरा कहल जाला । टोरा आ भात खाके बरत तुड़ल जाला ।
खान-पान के वैज्ञानिक पहलू
मड़ुआ के परयोग लोग प्रोटीन के स्रोत के रूप में करेला, एकर पानी सोखेवाला विशेष गुण के कारण पेचिश ग्रस्त रोगी के खिलावल जाला । मलशुद्धि करे में आ आंत के ताकत पहुंचावे में मड़ुआ के जोड़ नईखे । बाज़ार में रागी माल्ट के नाम से इहे मड़ुआ के सत्तू खूब बेचात बा । नोनी आ सतपुतिया रेशेदार आ सुपाच्य सब्जी ह । मड़ुआ, सतपुतिया से आंत के शोधन हो जाये आ बरत करके शरीर के आंतरिक पाचन क्रिया के तनिक आराम पहुंचावल आ फेर बूँट जईसन अनाज के खाना में शामिल करल पुरखन के वैज्ञानिक सोंच के परिणाम बुझात बा । ओठगन आटा, खांड भा गुड़ के मिलाके गाय के घीव में बनावल जाला । आयुर्वेद में किरीन फूटे से पहिले एह तरह के पकवान ( हलुआ, पुआ भा ठेकूआ ) खाये के कहल बा । एह परयोग से पित्त के शांति होला आ शरीर में अधकपारी जईसन रोग बाधा  ना आवे । आगे के 24 घंटा भूखे के बा त खाली पेट में पित्त के प्रकोप हो सकेला, एकरा के सामित करे के उपाय में सरगही खाये के कर दियाईल । पित्त के उत्पाती से पहिले ही पित्त ना बढ़े एकर उपाय कर दिहल गइल ।   
लोक परब लोग खाति बनावल बा । वैज्ञानिकता के धरम के आड़ देके जन मानुष मे प्रचलित कइल । लोगन के रहन सहन के सुधारल आ साथे साथे संस्कृति के रक्षा ही लोक परब के उद्देश्य होला । जीउतिता जईसन परब जवना में उंच-नीच, अमीर-गरीब के भेव भुला के माई आ संतान के परब बना दिहल गइल । धरम आ देवता के परे करके राजा जीमूतवाहन के गुण गावल गइल । एह दिन मेहरारू लोग बस इहे प्रार्थना करेला कि-  हे जीउत ! जैसे तोहार बलिदान के बदला में तहरा जीवन के अर्दोआय बढ़ल । ओइसहिन हमरो लईका-लईकी के अर्दोआय बढ़ाव ।                
संदर्भ :
1.    जीवित्पुत्रिका व्रत कथा, ठाकुर प्रसाद बुक सेलर्स, वाराणसी
2.    मगध की रहस्यावृत साधना संस्कृति – डॉ० रवीन्द्र कुमार पाठक
3.    बेताल बेताल पच्चीसी, विकिसोर्स डॉट ओआरजी
4.    बुद्ध, भारतकोश

Saturday, August 1, 2015

भोला बाबा, रवा ठीक बानी नू !?

साभार-श्रीन्यूज डॉट कॉम

हे भोला बाबा ! आज से सावन शुरू बा, भदइया बेंग लेखा राउर भगत लोग के जमात पैदा हो गइल बा । रवा गंजेड़ी भंगेड़ी रहीं की ना अब के जाने बाकी भगत लोग राउरे नावें आपन मन के मतवाला जरूर बनाई । 
अब कुछ भगत लोग अपना के भोला के सेना कहेला लोग । अब सेना चली , त अस्त्र शस्त्र चहबे करी... त ए बाबा, रउरा त्रिशूले भांजी... भगत लोग हॉकी सटीक , तमंचा, गुप्ती , तलवार भाला सब से लैस बा । अब चुनावी टिकट से पहिले नेता लोग आपन शक्ति प्रदर्शन करे ला, ओइसही ई भगत लोग अपना के एक दोसरा से जब्बर देखाई। अब रवा के चिन्हे के बा की कवन भगत बरियार बा ।

कुछ भोजपुरिया भगत लोग जे साल भ लहंगा रिमोट चोली कुर्ती के बटन में आपन सुर ताल के अझुरईले रहे, उहे सुरताल पे राउर भजन गा के औघड़ बन जायी लोग । अब रावा लोलिपोप के धुन पे तांडव जनी करब। कमर दोमे भर के काम बा ।

मौसम भी दोरस करत बा, कभी बरखा बुनी त कभी पसीना से चुनचुनी । आ ओपे सेकेंड सेकेंड पे पानी उझिलात। बाबा रवा बड़ा फेरा में पड़ल बानी... पानी में बोथईला से सर्दी बोखार आ देह में दरद नईखे नू ? होइबो करी त के देखेवाला बा ? कराहत होखब त बम बम के आवाज में भला के सुनो... जाये दीं ए बाबा ! होत फजीराहे एक पाता कालपोल आ सिट्रीजिन चढ़ाईब । निमुस्लाइड बैन बा, बाकी एहिजा खूब मिलेला । अब जान बुझ के गलत दवाई ना चढ़ाईब । लहसुन त खाईं ना ? ना त एकपोटिया लहसुन के चाय मे खौला के पियति त आराम मिलित । एक पाकिट बाबा रामदेव वाला दिव्य पेय चढ़ाईब, आपन मलकिनी से काढ़ा अवंटवा लेब । भोरे भेंट करब, तब ले बम बम

Thursday, June 18, 2015

ग्राम कथा : हमार गाँव पवना (भोजपुरी ई-पत्रिका "आखर" में प्रकाशित)

पन छोटहन नांव के उल्टा बडहन गांव ह पवना । नांव पे मत जायीं, पवना-पवनी भला इ कवनो नांव ह ? इ सही बा कि जगह के नांव से ओह जगहा के उंच-नीच के मालूमात होखेला बाकी एहिजा गांव के नांव से कथानक के कवनो लाग लपेट नईखे । विशेष में इहे बा कि मिसिर बाबा माने कथाकार के लईकाई के देह में एहिजे के धूर लपेटाइल बा । आउरी छोट-बड विशेषता बा, राउर नजरी के सोझा आगे आई ।
लीं गांव के नांव से शुरू भइनी आ एहिजे अटक गइनी । कहे के ढेर बा, आ एतने ना रउरो सुने के ढेर बा... मिसिर बाबा के परबचन !!!
अब रउओ इ मत कहब कि मिसिर बबवा का-का लिखत रहेला । अब पवना जईसन गांव प लिखला के माने का, जहाँ न कवनो ताजमहल बा, ना कवनो चमत्कारी मंदिर-मस्जिद भा दरगाह के नामो निशान । त मिसिर बाबा काहें  आपन मगज के कचरस प दोसरा के मगज पकावत बाड़े ।
बाकी पढ़ लीं, मने-मने गुन लीं, काहे से कि कबो कबो कचरा प मंदिर के चढावल फूल भी भेंटा जाला ।  कवनो हरजा नईखे, आ पढला के बाद लेखक प भुनभुनाइब मत... काहें से कि एह रचना खातिर कथाकार के नोबेल पुरस्कार मिली, राज के बात बा... इ हम आजे भोरे-भोरे सपना में देखनी ह ।
अब रउआ नक्शा पे पवना के खोजब त जहुआ जाइब । एह से हम एह गांव के ठीक ठीक रस्ता  देखावत बानी । गवें-गवें चलीं हमरा जोरे, पैदल भा गाड़ी से भा मन के कोरे कोरे, रास्ता आसान बा । मन मनसायी ना, आ कबो अकबकाई ना । त बाँध लीं फेंटा आ गोडे जूता चमरेटा । लीं सिरिराम जी के नाम आ करीं परसथान ।
  

बिहार के भोजपुर जिला के नांव जानत होखब !!! 
ना...!!!?
अरे उहे जवना के ढेर लोग अबहुओं आरा जिला कहेला ।
हँ हँ हँ.... ठीक बुझनी । उहे...
त कुछ बरिस पहिले तक भोजपुरिया इलाका में एगो कहावत चलत रहे- “ए०बी०सी०डी०” माने आरा, बलिया, छपरा आ देवरिया जिला । अब एह में आरा, छपरा त बिहार में भईल, आ बलिया-देवरिया उत्तरप्रदेश में । अब एह ए०बी०सी०डी० के पदवी काहे मिलल एकर कहानी तनी अंदरूनी ममिला बा, जवन एह क्षेत्र खातिर बदनामी जईसन कह सकिला, बाकी हम ना कहब । ज्यादे जाने के बा त बिहार-बंगाल के कोईलरी के लोगन से मिलीं, बता दिहें । रंगदार- लठैत इहे चार जगहा से रहन आ ओह में आरा सबले आगे रहे। इनका लोग से दहशत रहे । कहावत रही स-
“जिला में जिला आरा, आउरी सभे जिल्ली । बीरन में बीर कुंवर सिंह आउरी सभे बिल्ली ।।”
भा- “आरा जिला घर बा, कवन बात के डर बा ।”
त जे बा से की एह कहावत के थोर-बहुत छाप एह गांव में भी रहे । बाबु साहेब( लईका भा सेयान) आपन बबुआनी ना छोडत रहन । भले घरे सतुआ प जिनगी कटत होखे गांव के गान्ही चउक ( गाँधी चौक) प इनका सभे के रईसी देखे के मिल जात रहे । पनेहेरी के दोकान प बही के केतना पन्ना भराइल बा इ त उहे पनेहरी जाने । बाकी बाबू साहेब के ठाट रहे । आउरी भेद के बात कहके आपन गाँव के नांव ना नू हंसायिब । खैर अभी गाँव की सिवान धरीं ।
आरा के जीरो माइल से दू किलो मीटर आगे गड़हनी रोड प बढब, त तेतरियां गांव भेंटाई । एहिजा से एगो रास्ता बाएं गईल बा जवन सहार तक जाले, बस इहे पकड़ लीं । कहीं मुड़े के नईखे इहे राह पवना जाला । तेतरिया से 14 कि०मी० पड़ी पवना । अब गांव में घुसते जवन नजारा मिली त रउओ कहब कि जवन गांव प हेतना बतरस लिखाइल दूरे से उजाड़  लउकत बा । अरे महाराज ! घबराई जन इ उजाड़  जमीन त इ गांव के विशेष पहिचान देले बा । एकर चर्चा आगे मिली । आगे बढ़ीं त एगो चउरस्ता आई, जवना के एगो नाम देवल बा- गान्ही चउक ।
ना ना...!!! गान्ही बाबा से जुडल एहिजा कवनो अईसन बात नईखे । अब पुरनिया लोगन के सरधा से राखल एह नाम के महत्व ढेर बा । इहे चौक से एगो अउर  रस्ता फुटल बा जवन सन्देश जाले । एह रस्ता के कारण  गांव तीन-चार टोला में बंटा गईल बा ।
घबड़ाई जन !!! अब कहीं नईखे जाएके, इहें गान्ही चउक प सगरी गांव के भेद खुली । मिसिर जी के गांव के पहिचान करीं, मिसिर जी के मुखारविंद से उवाचरित । मिसिर बाबा के अलगे पहिचान बा एहिजा । इहाँ इनकर आस्तित्व इनकर बाबा के नावे जानल जाला । फलाना बाबा के नाती-पोता हवे । त उहे फलाना बाबा के पोता के लइकाई  से जुडल कुछ इयाद में गोता लगायीं जा ।
त गांव में प्रवेश भईल आ गान्ही चौक प पहुंचनी कि लोग बाग के नज़र में आ जाईब कि गांव खातिर केतना पुरान बानी । जान-पहिचान ढेर होई त पंवलगी शुरू हो जाई ।
“गोड लागीं ए बाबा ! ढेर दिन पे...”
“और हालचाल ठीक बा नू !!??? अभी रहे के बा नू ? साँझ के भेंट करब...”
एह गान्ही चउक से लेके मिसिर जी के मकान तक सड़क के दुनो ओर दोकान बाड़ीसन । एक से बढ़ के एक जिनिस के सामान भेंटा जाई । चाय के गुमटी से लेके खीरमोहन के झांपी तक । लकठो आ घुघनी के खोमचा से लेके ताड़ी के हांड़ी तक । मजमुआ इतर से लेके रेक्सोना के बोतल से फुहार फेंकेवाला सेंट तक । मरकिन के कुरता से लेके सिलिक के अंगिया तक सब एहिजे भेंटा जाई ।
अब अचकचायीं, दम धरीं... ढेर चीज भेंटाई देखे के... लीं गान्ही चउक प गंगामात एह सुगंध के निशा में त हम भुलाईये गईनी । मीठ आ तनी कासाह गन्ह एह गांव के एगो विशेष मिठाई के ह । अब कहब त हँसब मत... एह गांव खातिर इहे मिठाई बंगाली रसगुल्ला ह, आगरा के पेठा ह । अच्छा अब एकर नाम बता देत बानी । इ ह जिलेबी, आधा पकल जामुन के रंग के जिलेबी, तीसी के तेल में के छानल जिलेबी । गरमा गरम खाईब, त इ भुला जाईब कि केतना खईनी, रस के चुवत धार के अईसन सुडपब कि मन मिजाज तर हो जाई । खा लीं... अरे पचास गिराम आउरी लीं ...
अब जिलेबी प्रसिद्ध त एहिजा के चाट भी प्रसिद्ध । निराला, दिलवाला, दिल्लीवाला, कलकतावाला आ ना जाने का का... टाट के झोपड़ी में आगे सिंघाडा कचौड़ी, कोइला के चूल्हा प दिनभर पानी मिलत आ गरम होत मटर के छोला । ओह झोपडी में घुस के देखीं, गणेश आ लक्ष्मी जी के मूर्ति के साथे बदन उघाड़ हीरो आ कुल्हा के बल पे अटकल हिरोइन के फोटो जरुर भेंटाई । दोकानदार साहित्य के बहुत प्रेमी हवें, बिल्लो रानी चमन बहार लखनऊवाली के लिखल शायरी के किताब के चार लाइन भी लगयिले बा...
“सोना दिया सुनार को पायल बना दिया, दिल दिया यार को घायल बना दिया”
भा “ये खुदा हम तुमसे फरियाद करते हैं, मत भेज उधार मांगने वाले जो हमें बर्बाद करते हैं”
चाह-पानी के दोकान आ पान बीड़ी के दोकान अईसन दू जगह होला जहाँ गांव भर के खबर पहुंचेला । केकरा घर में आज हिंग के छौंका पडल बा इहो खबर मिल जाई एहिजा । बाकी रंज खुसी स्नेह से पगायिल गाँव के बेयार में सनायिल राउर मन मतंगा पे कवनो लाग लपेट के लपट ना लागी । एह गाँव के बाजार के इहे महिमा कि दस गो आउरी गाँव-जवार के काज परोजन आ बिध-व्यवहार के, मय नेवता-पेहानी के, खाजा-खजुली-बेलगरामी के सभकर वेवस्था कर देवेला । मास्टर हनीफ बैंड के पिस्टन से रामधुन के साथे राजा राजा करेजा में समाजा वाला गीत भी बाजेला ।
कुल मिलाके एह गाँव के बाजारे गाँव ह भा बदलत सामाजिक व्यवहार के ब्यापार करत गाँव अब बाजार ह । बाकी कुछो होखे, इ मिसिर जी के गाँव ह आ आपन गाँव के बडाई करब... रउआ  बुझे के बा त बुझ जाईं की गाँव बदल गईल बा ।  बाज़ार जादे आ व्यवहार कम हो गईल बा । मिसिर जी के लाल टीका देखि केहू पंवलागी भले जन करे बाकी ललका झंडा जरुर देखा दी ।

अब रउआ एह गाँव में अइनी त दुआरे आयीं, लचिदाना आ बतासा से खरमेटांव करीं । मुंह मीठ करीं आ जवन जबुन देखनी ओकरा के मने मत लायीं । गाँव ह हमार, हमरा खातिर त माई के आँचर ह, एही गाँव के धूर देहीं में लागल बा । जबुन ना कहब... ओइसे गाँव के दक्खिन सिवान प लिखल बा- आदर्श गाँव पवना में पधारने के लिए धन्यवाद ।

(इ कहानी- भोजपुरी के ई-पत्रिका आखर के फरवरी-2015 अंक में छपल बा । भोजपुरी साहित्य के पत्रिका पढे खातिर आखर के वेबसाइट www.aakhar.com पे जाईं )