लोकाचार के लबेद में निर्जला एकादशी
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शशि रंजन मिश्र ‘सत्यकाम’
आज निर्जला एकादशी ह। जेठ के महीना के शुक्ल पक्ष के एकादशी। ओइसे त एकादशी बारहों महीना होला। साल भर में चौबीस गो एकादशी। बाकि जेठ के लहकत गरमी आ ओहमें बिना पानी के उपवास बहुत कठिन होला, बाकि एकर महातम के बखान खूब भइल बा। सरग-नरक, धरम-अधरम से परे हट के एह परब के पाछे के गूढ़ आ गहिर बात बुझे आ जाने लायक बा। त जे बा से कि पढ़ल जाव लोकाचार के लबेद के बहाने एह परब पर...
त बात तब से जब से आदमी सामाजिक दायरा में बंधाइल, त
पुरखा-पुरनिया, ऋषि-मुनि, साधु-संत सब लोग समाज के रास्ता देखावल। समाज के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देत
कुछ नियम बनवले। बाकि आदमी के जात... जबले भय ना होखे तबले नियम-कानून ना मनावे। त
धरम-अधरम के भय देखावत सब नियम-कानून के परब-त्योहार बना दिहल गइल। इहे हाल एह जेठ
के एकादशियो संगे बा।
ऋषि-मुनि लोग आदमी के शरीर के खाली मांस आ हड्डी के ढाँचा ना मानल, बल्कि
एकरा में जवन देखल—
"छिति जल
पावक गगन समीरा, पंचतत्त्व रचि अधम शरीरा"
इहे पाँच तत्व जवना से एह दुनिया के सब जिया-जंतु, कीड़ा-मकोड़ा, देव-दानव
आ मानव बनल। एह पाँचो तत्व में पानी के बहुत-बहुत महत्त्व बा। कहल जाला आदमी के
शरीर में लगभग 70
प्रतिशत पानी होला। आ इहे पानी के उतार-चढ़ाव से देह में कई
तरह के रोग जनम लेला।
पुरनिया लोग के ई विश्वास रहे कि चंद्रमा के प्रभाव एह धरती के जल पर पड़ेला।
पूरनमासी आ अमावस के दिन समुंदर में ज्वार-भाटा के जोर जादे रहेला। आ एहि आधार पर
उ लोग के विचार रहे कि जब आदमी के देह में एतना पानी बा, त ओकरो
मन आ शरीर पर जरूर प्रभाव पड़त होई। वैदिक साहित्य में चंद्रमा आ मन के संबंध के
उल्लेख भी मिलेला—
"चन्द्रमा
मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत।।"
(पुरुष सूक्त)
माने चंद्रमा ओह विराट प्रकृति पुरुष के मन से जनम लेले। एहिसे आदमी के मन पर
चंद्रमा के प्रभाव के जोड़ल जाला। पश्चिमी दुनिया एह विषय पर खूब लिखले बा।
लूनाटिक इफेक्ट आ अपराध पर खूब चर्चा भइल बा। एह घरी अवसादी, उन्मादी
रोगी के रोग बढ़ जाला। आत्महत्या आ हत्या के मामिला बढ़ जाला। आ ई सब के पाछे
लूनाटिक इफेक्ट (पूरनमासी के चाँद के प्रभाव) बतावल गइल।
कम से कम अवसाद,
उन्माद आ आत्महत्या पर हमनी के पुरखा पहिले से उपाय सोच
लेले रहलें।
ओइसे त साल में 24
गो एकादशी होला आ ओतने पूरनमासी आ अमावस। प्रतिपदा भा एकम
से लेके पंद्रह दिन तक चंद्रमा के गुरुत्व बल के उठाव-चढ़ाव चलेला। दशमी से ई बल
के जोर तनी जादे होखे लागेला। पुरनिया लोग इहे बात के पकड़ल आ एकादशी के दिन चुनल।
गुरुत्व बल के बढ़त प्रभाव से शरीर के जलतत्त्व के बढ़ला पर बाँध लगावे के। एक दिन
के पानी से परहेज,
उपवास आ पानी में पैदा होखे वाला सब तरह के अनाज, फल आदि
से दूरी। बस इहे सेतिहा के उपाय रहे,
जेकर असर इतना रहे कि बिना हींग-फिटकरी के शरीर के लाभ
पहुँचावे। एकदम स्वीच लेखा। एक दिन रोक के शरीर के संतुलित कइल। बाकि आदमी के जात
जब तक भय के भूत ना देखे,
तबले कवनो नियम-कानून ना माने। त एही से धरम-करम, सरग-नरक
के बात के पाछे सब बैदई छुपा दिहल गइल।
अब बात निर्जला एकादशी के... एहू में उहे बात बा, बस नियम
तनी विशेष कड़ा कर दियाइल बा। बाकी एकादशी में तनी दूध, पानी, शरबत
चलियो जाय, बाकि एहमें पानियो ना पिए के। निर्जल माने बिना जल के... जेठ माने गरमी के
जेठई आ मानसून के शुरुआत। अब बरसात में पानी से होखे वाला कई तरह के रोग होला। पेट
के खराबी से लेके तरह-तरह के चमड़ा के रोग। आ पहिले के बैदई में कवनो चीज के अति
से पहिले रोक एगो बढ़िया उपाय रहे। निर्जल रहला से शरीर कमजोर ना होखे, बल्कि
ओकर आंतरिक शक्ति,
माने इम्युनिटी,
बढ़ जाला। भा सुतल इम्युनिटी जाग जाला, जवन आगे
के मौसम में शरीर के प्रतिरोधक क्षमता के बल बनवले राखेला।
भारतीय संस्कृति के विशेषता ई रहल कि ऊ स्वास्थ्य से जुड़ल कई सिद्धांतन के
धार्मिक आ सामाजिक आचरण के रूप में स्थापित कर दिहलस। एह से करोड़ों लोग बिना
वैज्ञानिक शब्दावली के जनले-बुझले बिना नियमित उपवास, संयम आ
आत्मनियंत्रण के अभ्यास करत रहलें।
एकादशी के अगर खाली धार्मिक कर्मकांड ना मानल जाए, बल्कि
शरीर के विश्राम,
मन के स्थिरता,
भोजन पर नियंत्रण आ आत्मचिंतन के अवसर के रूप में देखल जाए, त एकर
महत्व आजो ओतने बा,
जतना हजार साल पहिले रहल।
एह तरह कह सकीलें कि एकादशी खाली श्रद्धा के विषय ना ह, बल्कि
शरीर, मन आ आत्मा के संतुलन बनवले रखे वाला एगो प्राचीन भारतीय परंपरा ह। चाहे एकरा
के चंद्रमा के प्रभाव के संदर्भ में देखल जाए भा स्वास्थ्य के अनुशासन के रूप
में—एकर मूल संदेश एके बा—"संयम,
संतुलन आ सजगता।"

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