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Thursday, June 25, 2026

लोकाचार के लबेद में निर्जला एकादशी


लोकाचार के लबेद में निर्जला एकादशी

-        शशि रंजन मिश्र ‘सत्यकाम

आज निर्जला एकादशी ह। जेठ के महीना के शुक्ल पक्ष के एकादशी। ओइसे त एकादशी बारहों महीना होला। साल भर में चौबीस गो एकादशी। बाकि जेठ के लहकत गरमी आ ओहमें बिना पानी के उपवास बहुत कठिन होला, बाकि एकर महातम के बखान खूब भइल बा। सरग-नरक, धरम-अधरम से परे हट के एह परब के पाछे के गूढ़ आ गहिर बात बुझे आ जाने लायक बा। त जे बा से कि पढ़ल जाव लोकाचार के लबेद के बहाने एह परब पर...

त बात तब से जब से आदमी सामाजिक दायरा में बंधाइल, त पुरखा-पुरनिया, ऋषि-मुनि, साधु-संत सब लोग समाज के रास्ता देखावल। समाज के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देत कुछ नियम बनवले। बाकि आदमी के जात... जबले भय ना होखे तबले नियम-कानून ना मनावे। त धरम-अधरम के भय देखावत सब नियम-कानून के परब-त्योहार बना दिहल गइल। इहे हाल एह जेठ के एकादशियो संगे बा।

ऋषि-मुनि लोग आदमी के शरीर के खाली मांस आ हड्डी के ढाँचा ना मानल, बल्कि एकरा में जवन देखल—

"छिति जल पावक गगन समीरा, पंचतत्त्व रचि अधम शरीरा"

इहे पाँच तत्व जवना से एह दुनिया के सब जिया-जंतु, कीड़ा-मकोड़ा, देव-दानव आ मानव बनल। एह पाँचो तत्व में पानी के बहुत-बहुत महत्त्व बा। कहल जाला आदमी के शरीर में लगभग 70 प्रतिशत पानी होला। आ इहे पानी के उतार-चढ़ाव से देह में कई तरह के रोग जनम लेला।

पुरनिया लोग के ई विश्वास रहे कि चंद्रमा के प्रभाव एह धरती के जल पर पड़ेला। पूरनमासी आ अमावस के दिन समुंदर में ज्वार-भाटा के जोर जादे रहेला। आ एहि आधार पर उ लोग के विचार रहे कि जब आदमी के देह में एतना पानी बा, त ओकरो मन आ शरीर पर जरूर प्रभाव पड़त होई। वैदिक साहित्य में चंद्रमा आ मन के संबंध के उल्लेख भी मिलेला—

"चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत।।"
(
पुरुष सूक्त)

माने चंद्रमा ओह विराट प्रकृति पुरुष के मन से जनम लेले। एहिसे आदमी के मन पर चंद्रमा के प्रभाव के जोड़ल जाला। पश्चिमी दुनिया एह विषय पर खूब लिखले बा। लूनाटिक इफेक्ट आ अपराध पर खूब चर्चा भइल बा। एह घरी अवसादी, उन्मादी रोगी के रोग बढ़ जाला। आत्महत्या आ हत्या के मामिला बढ़ जाला। आ ई सब के पाछे लूनाटिक इफेक्ट (पूरनमासी के चाँद के प्रभाव) बतावल गइल।

कम से कम अवसाद, उन्माद आ आत्महत्या पर हमनी के पुरखा पहिले से उपाय सोच लेले रहलें।

ओइसे त साल में 24 गो एकादशी होला आ ओतने पूरनमासी आ अमावस। प्रतिपदा भा एकम से लेके पंद्रह दिन तक चंद्रमा के गुरुत्व बल के उठाव-चढ़ाव चलेला। दशमी से ई बल के जोर तनी जादे होखे लागेला। पुरनिया लोग इहे बात के पकड़ल आ एकादशी के दिन चुनल। गुरुत्व बल के बढ़त प्रभाव से शरीर के जलतत्त्व के बढ़ला पर बाँध लगावे के। एक दिन के पानी से परहेज, उपवास आ पानी में पैदा होखे वाला सब तरह के अनाज, फल आदि से दूरी। बस इहे सेतिहा के उपाय रहे, जेकर असर इतना रहे कि बिना हींग-फिटकरी के शरीर के लाभ पहुँचावे। एकदम स्वीच लेखा। एक दिन रोक के शरीर के संतुलित कइल। बाकि आदमी के जात जब तक भय के भूत ना देखे, तबले कवनो नियम-कानून ना माने। त एही से धरम-करम, सरग-नरक के बात के पाछे सब बैदई छुपा दिहल गइल।

अब बात निर्जला एकादशी के... एहू में उहे बात बा, बस नियम तनी विशेष कड़ा कर दियाइल बा। बाकी एकादशी में तनी दूध, पानी, शरबत चलियो जाय, बाकि एहमें पानियो ना पिए के। निर्जल माने बिना जल के... जेठ माने गरमी के जेठई आ मानसून के शुरुआत। अब बरसात में पानी से होखे वाला कई तरह के रोग होला। पेट के खराबी से लेके तरह-तरह के चमड़ा के रोग। आ पहिले के बैदई में कवनो चीज के अति से पहिले रोक एगो बढ़िया उपाय रहे। निर्जल रहला से शरीर कमजोर ना होखे, बल्कि ओकर आंतरिक शक्ति, माने इम्युनिटी, बढ़ जाला। भा सुतल इम्युनिटी जाग जाला, जवन आगे के मौसम में शरीर के प्रतिरोधक क्षमता के बल बनवले राखेला।

भारतीय संस्कृति के विशेषता ई रहल कि ऊ स्वास्थ्य से जुड़ल कई सिद्धांतन के धार्मिक आ सामाजिक आचरण के रूप में स्थापित कर दिहलस। एह से करोड़ों लोग बिना वैज्ञानिक शब्दावली के जनले-बुझले बिना नियमित उपवास, संयम आ आत्मनियंत्रण के अभ्यास करत रहलें।

एकादशी के अगर खाली धार्मिक कर्मकांड ना मानल जाए, बल्कि शरीर के विश्राम, मन के स्थिरता, भोजन पर नियंत्रण आ आत्मचिंतन के अवसर के रूप में देखल जाए, त एकर महत्व आजो ओतने बा, जतना हजार साल पहिले रहल।

एह तरह कह सकीलें कि एकादशी खाली श्रद्धा के विषय ना ह, बल्कि शरीर, मन आ आत्मा के संतुलन बनवले रखे वाला एगो प्राचीन भारतीय परंपरा ह। चाहे एकरा के चंद्रमा के प्रभाव के संदर्भ में देखल जाए भा स्वास्थ्य के अनुशासन के रूप में—एकर मूल संदेश एके बा—"संयम, संतुलन आ सजगता।"

Thursday, March 5, 2026

फगुआ के लोक-दर्शन : राग से विराग तक

फगुआ के आगमन होतहीं प्रकृति आ मनुष्य दुनो एक साथ बउरा उठेले। खेत में पीयर सरसों के मुसकान, आम के मंजर, हवा में घुलल सुगंध, चिरई के चहचह —ई सभ जीवन के भीतर छुपल ऊर्जा के नया रूप में जगा देला।
मैथिली के महाकवि विद्यापति लिखलेन— “आइल ऋतुपति राज वसंत, धावल अलि कुल माधवी पंत।

बसंत के राजसी छटा खाली मौसम के बदलाव ना, बलुक विज्ञान से लेके मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र आ आध्यात्मिकता तक के गहिर ताना-बाना में गूँथल बा। फगुआ–होली भारत के समेकित जीवन-अनुभव के रंग-बिरंग उत्सव ह, जेकरा में परंपरा, आनंद आ अपनापन गूँथल बा। खेत में पीयर सरसों फूले लागेला, आ मन में अइसन उमंग उठेला जइसे बरिसन बाद खुशी मिलल होखे। 

आनंद आ उमंग के एह परब के पाछे ढेर कथा कहानी बा, आ हर कथा के पाछे कवनो न कवनो वैज्ञानिक सोच छुपल बा। बसंतोत्सव, होली, फगुआ भा मदनोत्सव—एह सभ के जड़ में पुरुखन के गहन अनुभव आ जीवन-दृष्टि रहल बा।


फगुआ खाली रंग-अबीर के खेल नइखे; ई देह, मन आ आत्मा तक असर करे वाला सामूहिक अनुभव ह। फागुन के आवते प्रकृति में जवन बदलाव आवेला, ओइसहीं मनुष्य के भीतर नया ऊर्जा के संचार होखे लागेला। सूखल डाल पर नया पात फूटेला, खेत में हरियाली लहराला, समाज में उमंग के स्वर गूँजे लागेला। ई उमंग धरती के माटी से लेके जिया-जंतु आ लता-बिरवाई तक सभ में पसरल रहेला।

बाकि ऊर्जा कईसनो होखे, ओकर प्रवाह नियंत्रित होखल जरूरी बा। बेलगाम ऊर्जा शारीरिक, व्यवहारिक आ सामाजिक नुकसान कर सकेला। एही से पुरखा लोग ब्रह्मचर्य जइसन अनुशासन के माध्यम से काम-ऊर्जा के संतुलित रखे के बात कहत रहे। जाड़ा में गरमी आ बल बनवले रखे खातिर विशेष खान-पान आ औषधि के प्रचलन रहल। शरीर में ऊर्जा एकट्ठा होत रहल। बाकिर इहो साँच बा कि ऊर्जा के बाँधल ना जा सके—विज्ञान कहेला कि ऊ रूप बदलत रहेला। नदी पर बाँध लगावल जाय आ ओकर प्रवाह के साधल जाव त ओहसे बिजली बनेला; आ बाँध टूटे त विनाश तक हो जाला। एही से शरीर के ऊर्जा के साध के संगोरे के साथे साथ रेचनो (निकास) जरूरी बा।
ऋतु-परिवर्तन के दृष्टि से बसंत में कफ-दोष बढ़ेला। सक्रियता, नृत्य, धूप आ रंग-खेल शरीर के स्फूर्ति देला। चरक संहिता में वर्णित ऋतुचर्या अनुसार मौसम बदले पर शोधन जरूरी बा—
“तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत्। गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत्॥२३॥”1
(वसंत ऋतु में वमन (उल्टी) आ अउरी शुद्धिकरण प्रक्रिया करे के चाहीं। भारी, खट्टा, तेलवाला आ मीठ आहार से परहेज करे के चाहीं आ दिन में ना सुते के चाहीं।)

हमनी के पुरनिया लोग बड़ा चालाक रहले। स्वास्थ्य आ शरीर सबसे बड़का धन ह एह महातम के बुझते-समझते  समाज के हरेक व्यवहार में धरम-करम घुसा के समाज के एह तरहा बाँध देले कि जाने-अनजाने में लोगन के स्वास्थ्य के रक्षा होत रहल। 

काम-ऊर्जा के परवाह जब रुकी त कहीं ना कहीं घात करबे करी—मन में विकार लायी, शरीर दूषित करी आ फेर समाज के। मन के विकार दूर करे खातिर समाज में तरह-तरह के बरत, त्यौहार आ उत्सव बनावल गइल। बाल्मीकि रामायण में बसंतोत्सव के चर्चा मिलेला। भविष्य पुराण में कामदेव आ रति के पूजा के उल्लेख बा। संस्कृत साहित्य में एह उत्सव के बारे में खूब लिखल गइल बा। संस्कृत नाटक ‘चारुदत्त’ आ ‘मृच्छकटिकम्’ में कामदेव के जुलूस निकाले के चर्चा बा। ‘वर्ष-क्रिया कौमुदी’ में ढोल-नगाड़ा, गाना-बजाना, कीचड़ फेंकला आ हासो-परिहास के वर्णन बा। कालिदास के ‘ऋतुसंहार’ में बसंत के वर्णन अइसन बा कि आज के समय में उ वर्णन संभवतः विवाद का विषय बन सकेला। हर्षचरित, दशकुमार चरित्र आ कुट्टनीमतम् सभ में मदनोत्सव के चर्चा बा। 

अब सोचल जाय त समाज के एह तरह के उत्सव आ आयोजन के जरुरत काहे पड़ल? कारण साफ बा—काम-ऊर्जा के मनोविकार आ मनोरोगी होखे से बचावे खातिर। समाज एह उत्सव आ आयोजन के माध्यम से काम-ऊर्जा के मनोविकार आ मनोरोगी होखे से बचावे के उपाय खोजल। अश्लील हास-परिहास के छूट देके मन के विकार बाहर निकाले के उपाय कइलस। देखल जाय त पुरखा लोग एह तरह के आयोजन में अइसन-ढेर चीज समाहित कइले रहे जेकरा के साधारण लोग के समझ से बाहर रहे। आ एह तरिका के कईगो पश्चिमी वैज्ञानिक लोग पुष्टि कइले बा। उन्नीसवीं–बीसवीं शताब्दी के बीच आस्ट्रिया में सिगमंड फ्रायड2 नाम के एगो स्नायु आ मनोविज्ञान विशेषज्ञ भइलन। उनकर शोध ‘कैथार्सिस सिद्धांत’ में मन के भाव दबवला से मानसिक असंतुलन के चर्चा मिलेला। होली में हास्य, व्यंग्य, श्रृंगार, खुलापन—ई सभ मनोवैज्ञानिक रेचन के लोक-प्रक्रिया ह। जे बात सामान्य दिन में कहना मुश्किल होखे, ऊ होली में गीत बन के सहज निकलेला।  

होली के समय समाज अस्थायी रूप से उन्मुक्ति के अनुमति देला, बाकिर समय-सीमा के भीतर। ई अनुशासित अल्हड़पन आ नंगई भारतीय संस्कृति के सूक्ष्म संतुलन के उदाहरण ह।  

वाराणसी में होली पर खास किसिम के कवि सम्मेलन आ फाग-गायन होला। कवी लोग अंग प्रत्यंग के बखान वाला अइसन कविताई करेला कि कान में सीसा पिघल जाय—बाकिर समाज ओहिजा हुजूम लगा एह कार्यक्रम के सुनेला आ बुरा ना माने। ओइसहीं बरसाना के लट्ठमार होली में हुरियारा (ब्रज के ग्वाल-बाल जे होली खेले निकलेला) लोग ब्रज के मेहरारू लोग के सोझे अश्लील चौपाई आ छंद पढ़ेला, चुटकी लेला आ प्रेम से लट्ठ खा ले ला लोग। ई नजारा बाहरी दुनिया के बुरा लाग सकेला बाकिर लोकमानस में ई प्रेम-लीला के प्रतीक ह।

मदनोत्सव बीत जाए के बाद ई आचरण केहू ना स्वीकारे। एहि से पता चलेला कि समाज उन्मुक्ति के “काल-सीमा” तय कइले बा। ई स्वीकृति काहे? काहे कि ई काल-विशेष के छूट ह। होली के बाद ओही व्यवहार अगर दोहरावल जाव त उ सामाजिक आ कानूनी अपराध बन जाई। एहि से स्पष्ट बा कि लोकसंस्कृति में उन्मुक्तता के आजादी त दियाइल बाकि मर्यादा के चौखटो बनावल गइल बा।  

होली में खाली अश्लील हास-परिहास ना, राग आ रंगो के बड़का महातम बा। आ ई खेल अबीर–गुलाल तक सीमित नइखे। ई रंग भारतीय लोकजीवन में भाव, ऊर्जा, शुद्धि आ समरसता के प्रतीक ह। जब देह पर रंग पड़ेला, त ओही घड़ी सामाजिक भेद—जाति, वर्ग, आयु—सब कुछ क्षण भर खातिर मिट जाला। रंग समानता के माध्यम बन जाला।  
आयुर्वेद अनुसार वसंत ऋतु में कफ पिघले लागेला। चरक संहिता के ऋतुचर्या सिद्धांत बतावेला कि एह समय हल्का, कड़ुआ–तीख आ कसैला आहार उपयोगी होला— 
“गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत्॥२३॥”  

पुरान समय में होली के रंग प्राकृतिक फूल-पात से बनावल जाला—जइसे टेसू (पलाश), हल्दी, गुलाब। ई रंग त्वचा खातिर हितकारी आ वातावरण के अनुकूल रहत रहे। एह दृष्टि से रंग केवल खेल ना, बलुक ऋतु-परिवर्तन में शरीर के संतुलन के सांकेतिक अनुष्ठान रहे।  

आध्यात्मिक अर्थ में हरेक रंग के अलग माने बा। ब्रज परंपरा में होली राधा–कृष्ण के प्रेम-लीला से जुड़ल बा। कृष्ण के नीला रंग अनंत आ गहराई के प्रतीक ह, जबकि राधा के लालिमा प्रेम आ समर्पण के। पीयर रंग ज्ञान आ बसंत के प्रतीक ह, आ हरियर नया जीवन के। जब लोग एक-दूसरा पर रंग डालेला, त उ एगो आध्यात्मिक समरसता के अनुभव होला—“अपने ही रंग में रंग ले कान्हा।”  

होली में रंग लगावत समय हँसी, शोरगुल, गीत, नाच—ई सब मिलके मानसिक रेचन (Catharsis) पैदा करेला। रंग के छुअन से देह में स्पर्श-संवेदना जागेला। तेज रंग आँख के उत्तेजित करेला। सामूहिक हँसी तनाव घटावेला, आ एह तरह होली सामाजिक मनोचिकित्सा जइसन काम करेला। एह दिन “बुरा न मानो होली है” केवल कहावत ना, बलुक सामाजिक अनुबंध ह—कि आज के दिन मन के मैल धो डालीं।  

रंग के छींटा एक तरह से देखल जाव त माफी आ छमा के परतोख ह—पुरान मनमेटाव आ रंजिश के धो देवे के संकेत। होली के रंग देह पर चढ़ेला, फेर मन में उतर जाला। रंग से राग पैदा होला, राग से उमंग, उमंग से थकान, आ अंत में शांति होला। होली के रंग जीवन के ओह रूप के उजागर करेला कि एहिजा सब कुछ छणिक बा—आज रंग बा, काल धोआ जाई; बाकिर अनुभव के छाप भीतर रह जाई।  

अब जब रंग के उमंग भइल त होली में चंग, मृदंग आ ढोलक के थाप उठबे करी। फाग के राग में घुल के लोग विराग तक पहुँच जाला। फाग के बाद चइत के तान में विराग से विरह तक डूब जाला। कहल जाला-फाल्गुन बसंत के लड़कपन ह, त चईत ओकर बुढ़ारी। दीपचंदी आ कहरवा के मेल प दोगुन-चौगुन राग के फेंटत जब झाल, ढोलक, ताली आ सब कंठ एक हो जाय त शरीर के रोआं-रोआं नाच उठेला। ई स्वर-लय ध्यान के रूप ले लेला।  
“बँगला में उडेला अबीर… आहो लाल बँगला में उडेला अबीर…”  

एह गीतन में “लाल”, “हा”, “हू” जइसन ध्वनि खूब प्रयोग होला। “हा” आ “हू” नाभि-केन्द्र (मणिपुर चक्र) के आंदोलित करेले। मंडली में ढोलकिया ध्यान के केंद्र बन जाला, आ भीतर के वासना, क्रोध, आक्रोश लय-ताल में ढल के संगीत बन जाला।3  भारतीय पुराण4 परंपरा में ‘हाहा’ आ ‘हूहू’ दुगो यक्ष के उल्लेख मिलेला, जे गीत-संगीत में निपुण रहलें। लोकविश्वास बा कि फगुआ आ चैता के गायन में जब गवैया “हा…” आ “हू…” के लंबा आलाप लेला, त उ ओही यक्ष परंपरा के ध्वनि के गूँज होला।  “हा” के विस्तार छाती से निकलेला, “हू” के कंपन नाभि आ कंठ में गूँजे ला। ई ध्वनि वातावरण के झंकृत कर देला। एह नाद में देह के ऊर्जा जागेला, मन के आवेग बह जाला, आ चेतना ऊपर उठे लागेला। ढोलक के थाप, झांझ के टंकार, “हा-हू” के आलाप—ई सब मिलके सामूहिक ऊर्जा के विस्फोट पैदा करेला। ई विस्फोट विध्वंस ना, बलुक शोधन ह।  

ओशो के नाद-दर्शन5 में कहल गइल बा कि अनहद नाद (मन के अन्दर के आवाज) सुने से पहिले बाहरी शोर के खतम (विसर्जन) जरूरी बा। उनकर ध्यान-पद्धति में तेज संगीत, उन्मुक्त नृत्य, जोरदार श्वास-प्रश्वास आ फेर अचानक मौन—ई क्रम कई बेर दोहरावल जाला। ई मानसिक “रेचन” (Catharsis) के प्रक्रिया ह, जेकरा के ओशो ध्यान के जरुरी अंग बनवले।  

पूर्वांचल के धमाल आ फगुओ अइसने सामूहिक साधना ह-पहिले शोर, फेर थकान, फेर मौन। फाग के राग दोगुन चौगुन होते उन्हे पर पहुंचेला आ एकेबार ‘हाँ’ के आवाज के साथ ले तुड़ दियाला। क्रम चालत रहेला आ इहे यात्रा शोर से नाद तक, देह से देवत्व तक के ह।  

होली अस्थायी समानता के परब ह। जाति, वर्ग, पद के भेद कुछ समय खातिर धुँधला पड़ जाला। “सब रंग में एक” के भाव सामाजिक तनाव घटावेला। अइसन उत्सव समाज खातिर सुरक्षा-भाल्भ (safety valve) जइसन काम करेले-दबाव बाहर निकलेला, संरचना सुरक्षित रहेला।

फगुआ के अश्लील कह के नकारल उचित ना होई। लोक-संस्कृति के खुलापन विकृति ना, प्रकृति के सहज विस्तार ह। जब ऊर्जा मर्यादा में अभिव्यक्त हो जाला, त समाज स्वस्थ रहेला। एह तरह फगुआ–होली शारीरिक सक्रियता, मानसिक रेचन, सामाजिक समरसता आ आध्यात्मिक नवजीवन के समन्वित उत्सव ह। ई हमनी के  सिखावेला कि शुद्धि खाली नियम से ना, बलुक हँसी-खुशी, अल्हड़पन, राग-रंग आ उमंग के प्रवाहो से हो सकेला। फगुआ सिखावेला कि दमन से ना बलुक संतुलित अभिव्यक्ति से समाज स्वस्थ रहेला।

अंत में अतने कहे के बा कि होली मन के भीतर के मलिनता जला के चेतना के उजास देवे वाला परब ह-जहाँ हर साल आदमी अपने के अपने से  भेंट करावेला, राग-रंग में भींजेला आ फेर साल भर खातिर नया हो जाला। 

सन्दर्भ :
¹ चरक संहिता, सूत्रस्थान, तस्यशितीय अध्याय, श्लोक 23 — “तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत्…”
² Sigmund Freud, Studies on Hysteria (1895), कैथार्सिस सिद्धांत। 
³ मगध कि रहस्यावृति साधनाएं – डॉ रवीन्द्र कुमार पाठक 
⁴ हाहा–हूहू यक्ष उल्लेख — महाभारत एवं पुराण परंपरा (गंधर्व/यक्ष संदर्भ)। 
⁵ Osho, Dynamic Meditation Discourses, नाद व कैथार्सिस चरण।

Wednesday, August 27, 2025

कलकत्तवा मे पियवा बारे ललटेन

- शशि रंजन मिश्र 'सत्यकाम'


लइकाईं के सुनल एगो गाना इयाद बा। रेडियो पे सुने के मौका मिलल रहे। गायिका के नाम ठीक से इयाद नईखे कि के रहे... शायद विंध्यावासिनी देवी भा सिद्धेस्वरी देवी। बाकी गीत के बोल सुनी के इहे बुझाइल की आपन गाँव-जवार-माटी-पानी आ परिवार के छोड़ी के दूगो रोटी के जोगाड़ में लोग कहाँ-कहाँ ना गइले आ कवना तरह के काम ना कइले। गीत के दू लाइन- "कहाँ से आवे साहब बहादुर, कहाँ से आवे मेम... कलकतवा मे पिया हमरे बारे लालटेन" ओह समय के लोगन के सामाजिक स्थिति, दशा-दुर्दशा सभे के बता रहल बा। आ खाली इहे गीत ना अइसन ढेर गीत बनल जेह में ओह घरी के हालात के वर्णन रहे। चाहे भोजपुरिया क्षेत्र के लोकगीत भा सूरीनाम खातिर रवाना होत जहाज में बंधाइल मन के हूक में देस के छुटल आ परदेस के रोटी के जुगुत में भुलाइल घर-परिवार के चर्चा बा। रोटी त आपन देशवो में बा बाकी दू रोटी अधिका के लालच भा मजबूरी मे लोग परदेस के राह ध लेले ।


रोजी रोटी के खोज में परदेस के राह पकड़ल कवनों नया नइखे। कलकत्ता भारत के पहिलका व्यापार केन्द्र बनल। अंगरेजन के भारत पे कब्जा मारे के पहिलका उतजोग एहिजे से भइल। अंग्रेज़ सब के राज बढ़ोतरी के साथे प्राकृतिक सम्पदा के लूटे के एहिजा खूब मौका लउकल। आ ई खाली भारते के बात ना रहे, ढेर देसन में एहनी के इहे काम होत रहे। आपन राज्य के विस्तार में अंगरेजी हुकूमत हर तरहा के हथकंडा अपनवलस। व्यापार के नाम पे, कल कारख़ाना के नाम पे, रोजगार देवे के नाम पे हरेक देश आ ओहिजा के लोगन के खून चुसाइल। इंहा तक कि जब मॉरीशस,सूरीनाम आ फ़िजी जइसन देस .के अपना हिसाब से दुहे के खूब कोसिस भइल। प्राकृतिक सम्पदा त रहे बाकी एह संपदा के लूट के अंगरेजन के झोली में डाले खातिर ढ़ेर मजूरन के जरूरत रहे। जे खाये कम आ मालिक के कमा के जादे दे। सुरुआत में कुछ भारतीय व्यापारी , बढ़ई , लुहार जइसन कामगार लोग गइल बाकी ओहिजा जाके बंधुआ मजूर बन गइले। सन 1798 से लेके सन 1808 तक ई बंधुआ मजूरन के कबूतर बाजी चलत रहल। मई 1816 में मॉरीशस के गवर्नर के आदेस पे एहिजा से गइल बंधुआ मजूरन के आजादी त मिलल बाकी आपन देस के राह भुला गइल। ओह आदेस के बाद भारत से मजूरन के लावे पे रोक लगा दिहल गइल रहे। 1817 में ओहिजा से कुछ लोग लवट पाइल ।

ओह घरी ले अंग्रेजन के भारत पे सत्ता पे लगभग कब्जा हो गइल रहे। बाकी अभीयो एह देसन के विकास खातिर मजूर वर्ग के आउरी जरूरत रहे। मॉरीशस के गवर्नर के प्रार्थना पे ईस्ट इंडिया कंपनी एहिजा से भारतीय कैदी सब के भेजे लागल , आ इहो लोग ओहिजा बंधुआ मजूर बन गइले ।
सन 1833 में जब ब्रिटिस सरकार दासता प्रथा पे रोक लगवलस तब एह मजूरन के कमी भइल आ ओह कमी के पूरा करे खातिर अंग्रेज़ चाल चलले कंटरेक्ट आ एग्रीमेंट पे पाँच साल खाति मजूरन के भेजे के। परचार भइल कि बिदेस में नौकरी मिली। कंटरेक्ट पाँच साल खातिर रही, आवे-जाये के टिकस, पाँच रोपेया महिना के मजूरी , छौ महिना के मजूरी पहिलही मिली , मजूरी में से एक रोपेया कटाई जे पाँच साल के बाद एके साथे 60 रोपेया मिली , राशन -कपड़ा आ मकान सभे मुफुत जइसन लालच पसारल गइल। भारत के ओह समय में टुकड़ा-टुकड़ा में बंटाइल रजवाड़ा आ ओहपे निरंकुस शासन बेबस्था , रोजगार के कमी एक बड़ा मजदूर वर्ग खड़ा का देले रहे। आ इहे कारण भइल कि लोग दू रोटी आ आगे के निमन होत जिनगी के सपना देखत अंग्रेजन के कंटरैक्ट आ एग्रीमेंट पे अंगूठा लगा दिहले। जेकर कंटरैक्ट बनल उ कंट्राकी कहाइल आ जेकर एग्रीमेंट रहे उ गिरमिटिया बन गइल। चउदह गो पानी के जहाज के काल कोठरी में भरल भारतीय मजूरन के भाग के डोरी मॉरीशस के बंदरगाह पे बंधा गइल। उ जतरा कइसन रहल आ उ पाँच साल कइसे गुजरल एकर दरद सूरीनामी आ मॉरीशस के गीतन में भेंटा जाई। सरनामी गीतकार आ गायक राजमोहन जी के एक गीत के बोल देखीं -

कोई आँसू पीके रहेगे
कोई आड़े मेन सिसके है
रौई हे मायी बाबा
ठीहा मन मे धरी है
चलल जब जहजिया
कलकत्ता के किनारे
छुटल सब रिस्ता नाता
भगवान के सहारा
निकरले सरनाम के ओरे
नवा नवा तकदीर से नाता जोरे
कईसन हवा अब चली
दुई मुट्ठी एक दिन मजूरी

पेट के अगवे बुझावे खातिर लोग अंग्रेजन के सेना में भरती भइल आ अपने लोगन पे गोली दाग देलस । मंगल पांडे के कथा सभके मालूम बा, बाकी ओह विद्रोह के बादो अंग्रेजन के हुकुम बजावल आ रोटी खातिर ओहनी के गुलामी कइल ना छुटल। अब चाहे एकरा खातिर लोग विश्वो युद्ध में अपना के झोंक दिहले। अशिक्षा, लाचारी के मारले लोग कलकत्ता के राह धइले।

इहे कलकत्ता आज तक ले केतना के पेट पाल देलस। आजो कलकत्ता के बन्दरगाह, कारख़ाना, रेलवई, कोइलरी, मोहल्ला, सड़क, पार्क सभे जगहा रोजी रोटी के चिंता में हाड़ तुड़त, आपन गाँव घर के त्याग के लोगन के भीड़ लउक जाला। आ एह भीड़ में आपन भोजपुरी प्रदेश के लोग कुछ ज्यादे भेंटा जइहन । काम कवनों तरह के होखे , करे में शरम कइसन? परदेस में के देखत बा? गाँव के खेतिहर जमींदार बाबू साहेब कलकत्ता में कुलीयो गीरी कर लेस त के देखेवाला बा। आ कलकत्ता के आधुनिक रहन सहन के विदेस के दर्जा अइसहीं ना रहे। धनी बंगाली बाबू लोग के घोड़ा वाला फिटन गाड़ी त तनी कम आमदवाला खातिर हाथ रिकसा जवना में आदमी जानवर बनी के खिंचत होखे। सभे ठाट रहे। सड़क के किनारे रात में ललटेन के रोशनी खातिर तेल डाले के काम भा सड़क के धूर के पानी छिरिक के भीश्तीगीरियो के काम करे में लोग कभी कम ना बुझल। आ इहे ना जब इ लोग गाँवे लवटे त अस बखान करे कि अगर इ ना रहतें त मय कलकत्ता अन्हार रहित भा धूर मे उधिया जाइत। शायद इहे भाव एह लोग के महरारूनो के आइल होखी। तबे त बतावे में केतना गर्व के बात बा कि- "कलकत्तवा में पिया मोरे बारे ललटेन..."

एही भोजपुरिया समाज के आपन अलग पहचानो बनल। ए बी सी डी (आरा बलिया छ्परा आ देवरिया ) प्रदेश के लोग अड़ियल आ लाठी चलावे में आगे रहे। अब कोइलरी ,कल-कारख़ाना , साहेब लोग के कोठी हर जगहा पे इहे लोग के तैनाती रहे। अबहुओं पश्चिम बंगाल के आसनसोल, अंडाल के कोइलरी इलाका में इ बाबू लोग के तूती बोलेला।

आजादी के बाद देश के दशा बदलल कलकत्ता जइसन आउरी शहर के राह खुलल। मुंबई, मद्रास , दिल्ली अइसन लोग के नया ठिकाना बनल जे रोजी-रोटी के तलास में भटकट रहे। लोग नया परदेस मे नया कारीगरी नया हुनर सिखत दुनिया में आगे बढ़े लगले। शिक्षा के नाव पे अब इहे लोग समुंदर भी लांघ अइले बाकी बाकि अबकी बंधुआ मजूर ना बल्कि कुसल कारीगर बनी के। आज एही क्षेत्र के लोग हरेक क्षेत्र में आपन हुनर आ कारीगरी के लोहा मनवा रहल बा। गुलामी के सिक्कड़ से छूटते सभे के दिन दुनिया बदल गइल बा। कबो "पनिया के जहाज से पलटनीया.... " वाला गीत में आपन सोहाग के आवे के मनावत मेहरारू लोग खातिर बाजार अब घरे आ गइल। अब रोपेया पसीना के राहे आवेला त परदेस अब परदेस ना बुझाये। देश-बिदेश के दूरी अब कुछ घंटा के रह गइल बा अइसन में कवनों मेहरारू अब "रेलिया बैरन पिया के लेई जाय रे..." गीत गाके ना कोसे। बल्कि नवकी दुलहिनिया खुशी-खुशी आपन सवांग के परदेस नौकरी भेजे ले।

- शशि रंजन मिश्र 'सत्यकाम'

Friday, August 12, 2022

नून बिना फीका...

 

भोजन में नून ना रहे त स्वाद बेसवाद हो जाला। केतनों बढ़िया मर-मसाला से चटकदार भोजन रहे, नून ना रहे त सब फजूल बा। ई उहे नून ह जवन समुंदर के पानी में घोराइल बा आ जवना के किसान आपन देह गला के लोग के जीभ के स्वाद बढ़ावेला । किसान के देह के पोरे पोर से टपकत पसीना एह निमक के गुन बढ़ा देला । एकरा के असही रामरस ना कहाए...  एतना सहजे मिलेवाला निमक कबो एतना सहज ना रहे। ई सफेद निमक के इतिहास बड़ा लहूलुहान बा। एह निमक के पाछे यूरोप के देशन में कई गो लड़ाई आ ना जाने केतना जान माल के नोकसान भइल। इतिहास में लोग एकरा से व्यापार में लेनो देन करत रहे।  एह निमक के ई महातम कि लोग एकरा के पबितर माने। निमक के इज्जत रहे। लोग एकरा के आपन आन मानत रहे आ निमक के किरिया खा के जान दे देत रहे। निमक खा के ओकर आन रखे वाला आ बदल जाये वाला खातिर बाद में कुछ शब्दन के रचना भइल।

भारत में निमक के उपयोग कई सदी से होता। सिंध के पहाड़ से निकलल सेंधा निमक जहाँ उत्तर भारत के स्वाद बढ़ावे ओहिजे दक्खिन भारत के निमक समुंदर से मिल जात रहे। किसान खेत में समुंदर के पानी के भाप बना के उड़ा देस आ जमीन में बांचल निमक के बटोर लेत रहन। ई निमक सबके खातिर कम दाम पर उपलब्ध रहे। देश में जब ब्रितानवी शासन भइल त उ जर-जमीन पर कब्जा करत करत देश के खनीज-संपदा के दूहे लागल। एहिजा के धन संपती ब्रिटेन भेजाये लागल। एहिजा के लोगन से खेती बारी आ जमीन पर अंग्रेज़ सरकार रैयत वसूल करे। कवनों खुला व्यापार के पाबंदी लाग गइल। अगर व्यापार करे के होखे त अंग्रेज़ सरकार के खजाना में कर चुकावे पड़े। हालत ई कि आपने उपज के खाये खातिर कर देवे पड़े। एह अंगरेजी सरकार के जुलुम आउर बढल जब उ निमक के बनावे आ बेचे के सब अधिकार अपने ले लेलस। निमक किसानन के रोजी रोटी त मरइबे कइल, आम जनता के रोटी संगे निमको पर आफत आ गइल। अंग्रेज़ सरकार आपन बनावल निमक ऊंचा दाम पर बेचत रहे । भारत में यूरोप के बनावल निमक बेचाए लागल जे कवनों गरीब खातिर पहुँच से बाहर रहे।

19वीं शताब्दी के शुरुआत में एह निमक पर लगावल कर आ एकर व्यापार के लेके भारत के लोग बिरोध कइल। धीरे-धीरे ई विवाद बढ़त गइल। 1917 में गांधी जी बिहार के नीलहा किसानन खातिर सत्याग्रह कर के जीत चुकल रहन। ओकरे बाद अंग्रेज सरकार उनकर सत्याग्रह आंदोलन के आगे झुकल आ चंपारण के किसानन के दशा सुधरल। गांधी महतमा में लोग के आपन उद्धार करे वाला लउकल। निमक किसानन के दुर्दशा आ निमक पर कर के बात उनका बहुते अखरल। 1930 के शुरुआत में गांधी जी एह निमक कर के बिरोध करे के फैसला कइले। निर्णय भइल कि गुजरात के साबरमती आश्रम से दांडी के समुंदर तट तक पैदल जतरा कइल जाई आ आगे के रणनीति ओहिजे तय होखी। 


गांधी जी के साथ साबरमती आश्रम से कुल 78 लोग मरद मेहरारू के झुंड निकलल। टोली में केहू एकतारा लेलस त केहू ढोलक... गांधी बाबा दूल्हा बनी के आगे आगे चलले । साबरमती से दांडी के 395 किलोमीटर के जतरा में ई टोली जहां से गुजरे लोग साथे हो जास। 12 मार्च से शुरू भइल ई जतरा आपन 24वां दिन 6 अप्रैल के अपना साथे 50,000 जन समूह के  दांडी पहुंचल। लोग एह जतरा के देख के कहे कि जइसे उज्जर नदी बहत जात होखे। एकर कारण ई रहे कि उज्जर खादी पहिरले 50,000 मरद मेहरारू के टोली सत्याग्रह के नदी  बन गइल रहे।


6 अप्रैल के बिहान गांधी जी समुंदर के किनारे से मुट्ठी भर निमक उठाके निमक कानून पर लागल रोक के तूड़ देले आ लोग से आवाहन कइले कि अब निमक बनावल जाव। अंग्रेजियो सरकार दू महिना तक आँख मुंदले रहल आ कवनों धर-पकड़ ना भइल। गांधी जी आ टोली समुंदर के किनारे किनारे दक्खिन ओर बढ़त रहे आ निमक बनावत रहे। दांडी से 40 किलोमीटर दक्षिण मे धरसाना नाम के एगो जगह बा ओहिजा निमक के बनावे आ सफाई के कारखाना रहे। ओहिजा एगो सत्याग्रह के जोजना बनल आ उहो ओह घरी के कांग्रेस पार्टी बनवलस। एकर खूब प्रचार प्रसार भइल। बात अंग्रेजन तक चहुंपल बाकी कार्यक्रम से पहिलहीं गांधी जी के गिरफ्तारी हो गइल। फेर त जंगल में आग लागल, देश आ विदेश में ई निमक आ एकर सत्याग्रही लोग के चर्चा छप गइल। ब्रितानी सरकार के चोट पर पहिला बेर नून रगड़ा गइल रहे। ई आंदोलन एक साल चलल आ लगभग 60 हजार लोग जेल गइले । केतना काल कालवित भइले आ केतना लोग अंग्रेजन के जुलुम सहले उ बेहिसाब बा। बाकि एक साल बाद 1931 में आपन निमक के विजय भइल।

एकरा बाद 1931 के सितंबर से दिसंबर तक लन्दन में दुसरका गोलमेज़ सम्मेलन होत रहे आ ओहमें कांग्रेस के ओर से खाली गांधी जी अगुवाई कइले। ओह सम्मेलन में उ भारत के पूर्ण स्वराज के मांग कइले। बाकि ब्रितानी सरकार के घाव पर नून अबहीं लागले रहे , उ तिलमिला गइल आ गांधी जी प्रस्ताव नकार देलस। 

15 अगस्त 1947 के देश आजाद भइल आ देश आजादी के पचहत्तरवां (अमृत महोत्सव) मना रहल बा। एह आजादी के आवे में ना जाने केतना आंदोलन भइल आ केतना खून बहल बाकि बिना निमक के ई सांचहूँ फीका रहे। ना निमक के मोल बुझाइत ना आजादी आइत।

त अगिला बेर निमकदानी के उज्जर निमक के देखीं त एकर लाल इतिहास के जरूर इयाद करीं। आ कम से कम ओह 60 हजार स्वतन्त्रता सेनानी के आँसू आ दर्द के अहसान मनायीं कि आज ई निमक राउर स्वाद बना रहल बा।   

-   शशि रंजन मिश्र

 

Wednesday, September 22, 2021

कोहबर : बियाह के इम्तिहान के अंतिम पग ह

22 सितंबर 2017 ,फेसबुक पोस्ट

देहरादून में भारत के मलेटरी अकादमी बा । जहां से हरेक साल सैकड़न के संख्या में नया रंगरूट सब “भारत माता तेरी कसम, तेरे रक्षक रहेंगे हम” के नारा लगावत एगो अंतिम पग सीढ़ी के ऊपर चढ़ेला लोग ।

एह अंतिम पग के सीढ़ी उ जवानन के सफलता के सीढ़ी ह जे तरह तरह के शारीरिक आ मानसिक परीक्षा के पास कइला के बाद मिलेला । ओह जवानन के केतना मेहनत लागल बा उहे बता सकत बा जे एह अकादमी के धूर माटी के आपन पसीना से पटवन कइले होखे । एह अकादमी के राह आसान नइखे । तरह तरह के सवाल आ जवाब से जूझत, देह आ दिमाग के फुर्ती देखावत जब जवान एह दुआर पर चंहुपेला आ आगे कड़ा प्रशिक्षण के बाद के परीक्षा पास कइला पर अंतिम पग के सीढ़ी तक पहुँच पावेला ।
सन 1953 में एगो सिनेमा आइल – नया दौर । ई सिनेमा भारत के जवान लोग में एगो अलगे अलख जगवलस । समाज के बदले में जवान लोग के योगदान के कहानी बड़ा लमहर लकीर खिंचलस । एही फिलिम के साहिर लुधियानवी जी के लिखल एगो गीत बड़ा मशहूर भइल । उ गीत आजो सुनला प लोग के देह के पोर पोर नाचे लागेला । बांह फड़केला आ लोग जोश में आ जाले । गीत ह- ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का... साठ बरिस से अधिका ई बूढ़ गीत आज हरेक बरियात के प्रस्थान गीत बन चुकल बा । दुआर प बारात लागे के बा आ ई गीत बैंडवाला के पिस्टन से ना निकलल त लोग बैंडमास्टर के कोंचे लागेला कि ई गीतवा बजाव । जे लइका बियाह के उमीर तक आपन माई बाबू के जिम्मेवारी पर रहल । आपन हर चिंता फीकीर से निफीकीर जिनगी मस्ती में रहे उहे लइका के कान्हे एगो आउर ओइसने निफीकीर परानी के जिम्मेवारी आई । आ एकरा बाद दूनों निफीकीर लोग जिनगी भ खातिर फिकरमंद हो जाई । एक दूसरा के सुख दुख के खेयाल करत समाज में आपन पहिचान बनाई । बियाह लइका लइकी दूनों खातिर एगो इम्तिहाने ह । बियाह से पहिले तरह तरह के सवाल, लूर- गुर- लच्छन, योग्यता सब देखल पुछल जाला । अब एतना तरह के सवालन के बीच आगे के जिनगी में पास फेल के डर से जूझत लइका बियाह करे जब दुआर पर पहुंचल आ बैंडमास्टर के पिस्टन से ये देश है वीर जवानों का... निकलल । त ओकरो छाती चौरस हो जाला । मन के मजबूत करे में एह गीत के योगदान नकारल नईखे जा सकत ।
बियाह के एगो विध ह बरछेया भा छेंका । एहमें लइकी के घर के लोग ओकरा खातिर लइका जोहे निकलेला । लइका मिलल त ओकर देह दशा, दिमागी स्थिति,कुल खानदान सबके परीक्षण होला । सब तरह से संतुस्ट भइला के बाद ओह लइका के छेंका दियाला । माने लइका छेंका गइल अब ओकरा खातिर दोसर लइकीवाला ना आई । फेर बियाह के तैयारी शुरू होला । घर के मेहरारू लोग लइका के मंड़वे में देखि आ उहो लोग अपना अपना हिसाब से दूल्हा के इम्तिहान ले लेवे ला । सिंदूर दान आ फेरा के बाद दूल्हा दुल्हिन दूनों के कोहबर ले जाइल जाला । इहे कोहबर बियाह के कार्यक्रम के अंतिम पग ह । बाकि एह अंतिम पग तक पहुंचे से पहिले कोहबर के ड्योढ़ी पर साली लोग दूल्हा से तरह तरह के सवाल पुछेला । एह में दूल्हा के पास होखे के शर्त होला, सही जवाब ना त अंटी से रोपेया ढीला करस । एह इम्तिहान में पास भइला के बाद कोहबर में जाये के मिलेला । 1965-66 में केशव प्रसाद मिश्र के एगो किताब आइल रहे कोहबर के शर्त । बलिया जिला में दुगो गाँव बा बलिहार आ चौबे छपरा । बलिहार गंगा से उत्तर त चौबे छपरा गंगा के दक्खिन । एही दूनों गाँव के दू गो परिवार के बीच बियाह के संबंध के उपन्यास ह – ‘कोहबर के शर्त’ । एही कहानी पर सिनेमा बनल – नदिया के पार । सिनेमा के एगो दृश्य में दूल्हा के साली आपन सहेली सब के संगे कोहबर के दुआरी पर खड़ा होके क़हत बाड़ी- “ये कोहबर का द्वार है पहुना, इसे ऐसे नहीं लांघने पाओगे ! यहाँ दुआर पढ़ना पड़ता है। कोई दोहा कवित्त या सवैया सुनाओ पढ़ के...” । कोहबर में एगो देवार पर चरखुट चित्र बनावल जाला । ऐपन, हल्दी आलता से दूल्हा दुल्हन के जीवन के मंगल कामना लिखाला । दूल्हा दुल्हिन दूनों ओह मंगलकामना के पढेले आ एक दूसरा के सुख दुख के साथ के प्रतिज्ञा लेवे ले । इहे कोहबर के असली शर्त ह । कोहबर में साली सलहज लोग आ घर परिवार के मेहरारू लोग से दूल्हा के परिचय होला । हंसी मजाक के साथे लोग दूल्हा के परखेला । इहे अंतिम पग ह बियाह के सब रस्म रिवाज के ।
एह कोहबर के विषय पर उज्जवल पाण्डेय के निर्देशन में एगो सिनेमा आइल बा- कोहबर ।

10 मिनट के छोट सिनेमा – देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर के मान पर खरा उतरता । सिनेमा समाज के हर व्यवहार के आपन छोट कहानी में समेट ले ले बा । समाज में लइकी लोग के दशा, समाज के व्यवहार आ बियाह खातिर सामाजिक मजबूरी सब कुछ । गरीब घर के पढ़ल लिखल लइकी के एगो बौराह साथे बियाह सामाजिक आ पारिवारिक मजबूरी देखावता । त ओहि दृश्य में पूरा घर परिवार के सोझा आपन दूल्हा के बेइज्जती पर दुल्हिन के बिरोध आ दूनों जिनगी के जिम्मेवारी अपने लेवे के जिद कोहबर में संपरल शर्त के साथे नेयाय करता । गरीब पिछड़ा आ मध्यम वर्गीय समाज में आजो लइकी के स्थिति ओतना बढ़िया नइखे । जवान होते लइका जोह के बियाह कर द आ गंगा नेहा ल । लइका के का स्थिति बा ओह से मतलब बस अतने कि हमार लइकी ओह घर में जिनगी काट त ली । अब एह में लइकी के भाग्य, कोहबर के इम्तिहान में दूल्हा के खरा आ खोटा भइले ओह दुल्हिन के जीवन के पहिला परिचय होला । भाँवर आ कोहबर के शर्त त इहे बा कि एक दोसरा के साथ देवे के । एक दोसरा के सहारा देवे के । अब दूल्हा खोट निकलल त का लइकी ओह संबंध के नकार देवो । सिंदूर दान, कन्यादान आ भाँवर के बाद जब भेद खुलल त ओह लइकी पर का गुजरी जेकरा से बिना पुछले, बिना पहिचान करवले एगो बौराह से गांठ जोड़ दिहल गइल । सिनेमा के दृश्य में दुल्हिन के चेहरा के भाव एह बात के खंखर के चुपचाप कह देता । समाज में मेहरारून के बराबरी के आवाज के उठावत दुल्हिन आपन दूल्हा के संगे चल देत बाड़ी । “आमवा से मीठ महुईया, महुआ में लागि गइले कोंच” के दरद भरल आवाज के साथे आगे के जिनगी बितावे ।
सिनेमा के कलाकार राजू उपाध्याय आ मनीषा राय आपन अभिनय से कोहबर के कहानी के एको सुता हीले नईखे देले लोग । कहानी के साथे संवाद अदायगी आ अभिनय के कसावट एह सिनेमा के एगो नया आकाश देखा रहल बा । पिछला 30 बरिस से भोजपुरी बढ़िया सिनेमा खातिर हहरल रहल ह । टप्पा टुइयाँ कुछ बढ़िया सिनेमा जइसे देसवा आ लघु सिनेमा ललका गुलाब भोजपुरी सिनेमा के अंतिम सांस पर गंगाजल के काम कइलस । एही कड़ी में उज्जवल पाण्डेय जी के कोहबर आइल बा । उम्मेद बा आगे आउर एही तरह के बढ़िया सिनेमा से भोजपुरी के उखड़त सांस के बचइले रहिहें ।
सिनेमा के लिंक-
शुभकामना

Saturday, January 28, 2017

सकरात के बात



 (ई रचना भोजपुरी संगम के जनवरी -२०१७  अंक में छपल बा )
गोड़ लागीं ए बाबा !कउड़ सेंकत रमेसर हाँक मरले । पंडित घरभरन मिसिर भोरे भोरे मुँह में दतुअन कचरत आ दायाँ हाथ में लोटा हिलावत चलल आवत रहन । दतुअन होठ आ दाँत के मिलल जुलल पगुरांव प अपने आप कब्बो दायाँ गाल त कब्बो बायाँ गाल फेरात रहे । थूक आवे त दाँत में दतुअन  के दबा के आगे के दू दाँत के फांक मुंहे पिच्च से थूक देस । कान पर जनेऊ के तीन फेरा देवे में स्वेटर आ गंजी एक ओरे से उचकत रहे ।
पंडित घरभरन मिसिरगाँव देहात में पुजाले । सतनराएन के कथा से लेके सप्तसती के जबानी घोंट के पी लेले बाड़ें । शुम्भ-निशुम्भ आ कुम्भ ना जाने कई तरह के बियाह के मंतर जानेलन । अइसन मनई से हर कोई आस राखेला कि ओकर समस्या के निदान त मिलिये जाई । अब उ भले पतरा देख के बतावस भा जतरा देख के... लोगवा त पुछबे करी । सांझे पुछी, बिहाने पुछी ... आते पुछी त जाते पुछी, कब्बो नहाते त कब्बो मर मैदान जातो पुछी । त बाबा घरभरन से काहे ना पुछी । लोग पुछल... लोग ??? अरे ना रमेसर पुछले हाँ । पुछले हाँ... अबहीं कहाँ... अबहीं त पुछे के सुरता बनवले हाँ ... पांवलग्गी आ उहो दूरे से । मुँहे से उचरले हाँ । आसीरबादो मिलल ह । मुँह के बायाँ ओर के दाँत से दतुअन दबा के... अपना से बाएँ तीन फर्लांग दूर पिच्च से थूकला के बाद ।  “...जै जै रमेसर बाबू । आबाद रहीं.... अहा हा ! आग तापत बानी !? इहो सिद्ध लोग के काम ह - धुनी रमावल आ पंचाग्नि तापल । रवा त पहिलहूँ के सिद्ध हईं । ना आगे नाथ ना पीछे पगहा... राउरे मरजाद बा सउंसे जगहा । कहीं... कुछ कहल चाहत बानी का ??”
ना ए बाबा, कहे के का बा... देवता मनई के भोरे-भोरे दर्शन भइलो त पुन्न ह ।
अहा हा हा... जीहीं, जीहीं । खूब कहनी... बाकी ए रमेसर बाबू हई मर मैदान के रास्ता रोक के दर्शन करे के ममिला गड़बड़ बुझाता ।
हा हा हा ... बाबा के बात । अब का कहीं ए बाबा... रवा अइसे त भेंटाईं ना । कब्बो फलनवा जजीमान किंहा छठीहार सतईसा त कब्बो चिलनवा जजीमान किंहा सराध । राउर त गोड़ में चकरी लागल रहेला । अब रवा से भेंट करे खातिर इहे नीक राह लउकल ह । जानते बानी गाँव देहात के लोग दिन में भले मत लउके बाकी साँझ बिहान सीवान ओरे भेंटा जाई । अब घर से नजदीक जवन सीवान ओनही पठान ।
त आज हमार सीवान छेंकाइल बा । खूब कहनी बाबू साहेब । रुकीं... अब हेतना उतजोग कइनी त राउरो समस्या सुनिए लिहल जाव । दू मिनट आउरी दम धरीं... आईं हई इनरा पर से तनी दू बाल्टी पानी के इंतजाम करीं... हाथ मलीं आ मुँह धोईं । मर मैदान के मुँहे त भगवान के नामो ना लेवे के... रवा कहीं जतरा पतरा के बात करब त दिक्कते होई ।
रमेसर उठ के दू बाल्टी पानी के बेवस्था कइलन ।  जै जै.. बड़ा गरम पानी बा एह इनरा के ।
नहइबो करब का ए बाबा ?”
अरे ना ना... बड़ी जाड़ बा हो... घरही नहाइब । अबही त मंतर स्नाने से काम चली... दू दिन बाद सकरात आवता । बनारस के प्रस्थान होई, ओहिजे गंगा जी में भर जाड़ के स्नान के फल लेहब ।
सकरात गुने त हमहूँ अइनी हाँ... अब रवा से का छुपल बा । सकरात पर कुछ शंका समाधान त रवे नू कर सकीले ।
लीं...भल कहनी । सकरात पर पुछब आ उहो सूखे सूखे । रवा सोझे हाथ मुँह धोके बइठल बानी आ खाये पीएवाला परब पर बतकही कइल चाहत बानी .... ई ना होई । मंगाईं पाव भर चूड़ा, गुड़ आ चार पाँच गो लाई-तिलवा तब नू गेयान के गठरी खुली ।
ए बबुआ दुर्गेश, तनी हाल दे घरे धाव.... माई से सेर भर चूड़ा, गुड़ लाई तिलवा मांग के लाव... बाबा के सीधा देवे के बा । भाग के जा आ धउड़ के आव त” –रमेसर आपन लईका के कहलें । ए बाबा रवो शुरू करीं, पनपियाव त आवते बा...
हं हं काहे ना... तनी जगह बनायीं । जाड़ में कउड़ के आग से बड़ सुख का होई... हाँ त रमेसर बाबू , का पुछे के रहल ह ?”
बाबा, एगो शंका रहल ह, सकरात में दहीये-चूड़ा आ खिचड़ी काहे ?”
जै जै... बड़ा नीक पुछनी । माने कोतवाल से कोतवाली के हाल पुछल जाला । सब भेद खुल जाई त हमरा अगिला बेर से ना चूड़ा भेंटाई ना लाई तिलवा के नेवान होई ।
हा हा हा... रवो नू , बतिया के कहाँ से कहाँ ले जाइले । शंका एह से आइल ह कि केहू एकरा के खिचड़ी कहेला, कहीं सकरात, कहीं पोंगल आ सब जगहा लगभग एके लेखा विध वेव्हार तिल गुड़ के... खिचड़ी के... इहे बड़ा कन्फूजन हो गइल कि ई काहे आ कइसे... आ अइसे त कबसे ?”
लीं... राउर शंका त लमहर राह लेता । एगो पुछब त दोसर निकली । दोसर त तिसर ... रुकीं बतावत बानी... लीं हई देखीं पनपियाव आ गइल । रवो सभे लीहीं । अब बात कुछ गंभीर होई त मुँह चलत रहे ।
हं त रवा सभे जानते होखब हमनी के पुरनिया के... बड़का वैज्ञानिक सोच रहे लोग के । रीत रिवाज आ विध वेव्हार से समाज के अस बांध के रखलस कि देह दशा तनिको ना बावें होई ना दहीने । जेतना लोक परब बनावल गइल उ उहे लोग के देन ह । प्रकृति, समय आ भौगोलिक स्थिति के सटीक विश्लेषण जेतना पुरुखा लोग कह गइल बा ओतना आज के वैज्ञानिको जुग में अंदाज लगावल संभव नईखे । माटी, पानी, हवा, आकास, धूप, छाँव जईसन प्राकृतिक चीजो वैज्ञानिक यंत्र रहे ।
हाँबतिया त साँच क़हत बानी... का, कब आ कइसे के वेव्हार ई त सांचहूँ बतावल बा... त फेर आगे कहीं ।
देख ! भारत के भौगोलिक स्थित एक नइखे । समशीतोष्ण  प्रदेश कहाला । कहीं कंपकपात जाड़ त कहीं चिलचिलात गरमी । कहीं लहलहात खेत, कहीं जंगल त कहीं पहाड़ आ पठार । कुछ प्रदेश में नदी नाला आहर पोखर के जाल त कहीं सालों भर सुखाड़ । अब अईसन परिस्थिति में कवनो लोकपरब मनावे के तरीका आ समय बिलकुल अलग होखबे करी ।  पूरा भारत में जगह आ सुविधा के अनुसार लोक-परब के मनावे के विधि आ समय अलग बा । बाकी सभे के पाछे एके उद्देश्य इहे बा  कि मय समाज एह परब में गुंथा जाव । ना बड़-ना छोट, ना छूत- ना अछूत, एह लोक-परब में सब भेव मिट जाव ।  लोक परब के अबूझ संसार के रीति रिवाज आ विधि के पाछे जवन पुरुखा पुरनिया के वैज्ञानिक सोच छुपल बा उ धेयान देवे योग्य बा ।
साँच बात”- रमेसर के साथे ओहिजा बइठल दू जाना हुंकारी  भरले ।
जाड़ के मौसम में शरीर के ज्यादा ऊर्जा के जरुरत पड़ेला । देखते बाड़ऽ कि बगैर एह आग के तापले देह के हाड़ जरनेटर लेखा हिलत बा । ठंढा जगहा में  लोग खूब माँस मछरी खाला कि देह गरम रहो । हमनी के का मर मसाल, मकरध्वज आ चवनप्रास । एतना तक त ठीक बा कि खाए पिये से गर्मी आ जाला बाकी एकरा साथे महनतों के जरूरत पड़ेला । बाकी जाड़ा के मौसम में लोग ऊर्जा के अभाव में आलस्य के कोरा में बइठल रहेले । अब बदलत प्रकृति के अनुसार हरेक जीव जन्तु, पेड़ पौधा अपना के ढाल लेला आ प्रकृति के साथ समरस हो जाला बाकि मनुष्य के आपन प्रकृति बा । समस्त संसार पे विजय के चाह राखेवाला मनुष्य अपना के प्रकृति के साथ ना बदलेला आ आपन नुकसान करेला ।
हाँ बाबाबतिया ठीक कहत बानी । हमरो मन करत रहता कि खरिहान में खटहुल में जाके पुअरा के गरम बिछावना पे दिन भर चद्दर तान के सुतीं । बाकी जानते बानी गाय गरु , खेती बाड़ी के काम छोड़ के नींद लागो । चवनपरास से इयाद पड़ल ... अबकी सुदेशन वैद का जाने चवनपरास बनवलन कि ना... पिछला साल त बाजार से लेनी त बुझात रहे कि सकरकंद के हलुआ होखे । सुदेशन वैद के बनावल एक चमच खाये त देह पर से सुटर शाल सब उतार जाय...”- मड़ई जादो कउड़ के आग उटकेरत कहलन ।
अरे मरदे दम धरऽ... तहरा के सुनीं कि बाबा के”- रमेसर खिसियइलन । हाँ त रवा कहत रहीं बाबा... बड़ा नीक जानकारी बा
अरे ना हो, मड़ई ठीके इयाद करइलन ह सुदेशन वैद के... बड़ा विद्वान आदमी उहो... ढेर बात उनको से होला । उहे कहत रहन कि वैदई में मानल जाला कि शरीर के छलावे में तीन चीज के ईंधन काम करेला । आ एह तीनों के तनिका से हेरफेर से शरीर मे रोग बेआधी हो जाला । वैद जी शरीर में वात (वायु) , पित्त आ कफ रहेला आ एकरे के त्रिदोष कहत रहन । इहो बतावत रहन दोष के प्रकृति के अनुसार ही खानपान आ उपचार में बदलाव करल जाला । माने जइसन देवता ओइसन पूजा । अब सुनऽ एह सकरात के हाल... उहे वैद जी के भेद खोलल ह । आसीन (आश्विन), कार्तिक महिना में पित्त के प्रकोप ज्यादा होला । शरीर के भीतरियो आग बा जावना के पित्त कहाला आ एकर प्रकृति अमलीय ह, जे खाना पचावे के काम में आवेला । बाकी जब एह आग के दंवक अपना मान से तेज हो जाला  त आंत के नुकसान पहुंचावे ला । पित्त के प्रकोप से शरीर में जलन, पेटदर्द, उल्टी, पेट के दोसरो रोग जनम लेला । आ एह पित्त के प्रकोप तब आउरी बढ़ जाला जब ठंढ भगावे के फेरा में लोग अनाप-सनाप चीज खायेला । तेज मसाला, गरम पेय, शराब आ मांसाहारो एक बड़ा कारण बा पित्त प्रकोप के । आ एह तरह के खान पान के प्रयोग बहुत पहिले से कर रहल बा । अब एह शारीरिक पित्त के शांति पूस आ माघ के सकरात के समय करल जाला ।
वाह बाबा, हम त जानत रहीं कि रवा खाली मंतरे जानीले... रवा त हेतना निमन से वैदयी के बातो बतावत बानी ।
अरे इ सब अनुभव के बात ह । लोग से जाने सीखे ले मिलेला । त कहत रहीं कि मकर सकरात के दिन नया धान के चूड़ा (चीवड़ा, पोहा), दही के साथे नया फसल के गुड़, तिल के खाये के प्रथा सगरे बा । अब सुनऽ आउरी विज्ञान के बात । पुरनिया सब जवन खोज कइले नयका लोग अब खोजता । सोचऽ घर के नाली जाम होला त का कइल जाला?”
फराठी भा लग्गी से गाद आ कचड़ा के निकालल जाला भा आगे ठेल दियाला कि पाछे के पानी निकल जाव ।”-रमेसर कहले ।
चाबस बाबू साहेब... हम एही से नू कहिला कि रवा सिद्ध हईं । बात के कोर पकड़ के सीधे जड़ तक पहुंचीले । इहे चीज त पेटवो खातिर कइल जाला । अब पेट में लग्गी ना नू कोंचब.... त एकरा खातिर अइसन वेवस्था कइल गइल कि मय जमा खर्चा बिना हिंग फिटकिरी के निकल जाव । हमनी के खेतिहर समाज, एही प्रकृति से उपाय लेलस । हई चूड़ा के गुण जानते बाड़... पाव भर खाइब त कुछ देर में सेर भर खइला लेखा लागि । पानी मिली त पातर सुखल चूड़ा फूल के आपन औकात से बेसी हो जाला । त पेट के आंत में सटल जेतना गंदा पदारथ बा ओकरा के चूड़ा सोख ली । दही के गुण त जानते बाड़ कि पेट के निरोग रखेला । आ साथे साथ गुड़ पेट के अग्नि के ताप के दूर करेला ।
वाह, ई त सेतिहा के लाख रोपेया बराबर बात बतवनी । बाकी तिल-गुड़ , तिलकुट लाई काहे ?”
अरे ई त हमरो न मालूम रहे । वैद जी कहत रहन कि भुंजल तिल आ गुड़ से कब्ज ठीक हो जाला । अब पुरखा पुरनिया लोग ई जानत होई तबे सकरात के पेट सफाई के पूरा इंतजाम एके साथे कर देले रहे ।
सही कहत बानी बाबा... पुरनिया लोग हमनी से जादे विद्वान रहे । हरेक चीज के उपाय सेतिहे आ सहजे बता देलस लोग...
अरे आगे सुनऽ ... दिन में चूड़ा-दही से पेट के जब मल के निकास हो गइल  त रात के खिचड़ी... कि जड़ी पच जाये आ पेट के आरामों मिल जाये ।
ए बाबा  राउर बहुत बहुत धन्यवाद एह शंका दूर करे खातिर । बाकी एगो आउर सहजे प्रश्न उठट बा कि खाये पिये से त बुझा गइल कि शरीर  के लाभ मिली बाकी हई तिलंगी (पतंग) काहे  उड़ावल जाला ?”
हा हा हा... कहनि हाँ नू कि आदमी के स्वभाव ह आराम करे के... पेट भइल भारी त अब का लदब व्यापारी । माने अघाइल बैला के हौ ... पेट भरल ना कि देह हाथ सोझ करे आ आराम के फिकीर । त पतंगबाजी से माघ के गुनगुना घाम देह में लागो आ खेलत कूदते चूड़ा के भारीपन दूर हो जाय त का हरज ।
वाह, माने आम के आम गुठली के दाम वाला बात
अरे अतने ना, आउर सुनऽ...  एह पतंगबाजी में योग साधना घुसल बा । भारतीय साधना पद्धति में बिन्दु साधना एगो महत्वपूर्ण अंग ह । एह साधना में एक बिन्दु पे धेयान केन्द्रित कराल जाला । आँख, बुद्धि तेज करे के सबसे बढ़िया उपाय लईकन के पतंगबाजी ह । पतंग के हरेक लोच आ कलाबाजी के साथ मन आ शरीर के मेल साधना के अनूठा रूप ह । सकरात के दिन के चूड़ा दही के भारी भोजन के खेल कूद में पाच जाय आ साथे एक साधना हो जाये , एही सोच के साथे सकरात के पतंगबाजी जोड़ दियाईल ।
बाबा त एह में पूजा पाठ कवना काम के ?”
लऽ... लगल नू आपन बुद्धि लगावे । हम कहत रहीं  नू कि भेद जानते हमार दान दक्षिणा पर आफत हो जाई आ तू अबहियें ओकर झलक देखावे लगल ।
ना बाबा, राउर सीधा-पानी त चलते रही, बस इहे अंतिम शंका रहल ह । जब एतना बता देनी त इहों बता दीं ।

अच्छा त इहों सुन ल... सकरात खाली लोकपरब ना ह । ई पुरखन के वैज्ञानिक सोच से उपजल, मौसम के संधिकाल में शरीर के शोधे के परब ह । खात पियत खेलत कुदत एगो बड़ स्वास्थ्य रक्षा के उतजोग हो जाये आ एकरा में हिंग ना फिटकरी खाली आनंदे बरसे त इहे नू लोकपरब के असली माने कहाई । सुरूज साक्षात ऊर्जा के प्रतीक हवें, अब राशि ग्रहचाल से उनकर स्थिति जवन होखे, बाकी एह परब में उनको के पूजा करल जाला । एह घरी सब नया अन्न आवेला त हरेक खेतिहर के ई कर्तव्य होला कि एकरा खातिर प्रकृतियो के धन्यवाद देवे । अब एह में प्रकृति के इयाद कइल, पुरखा पुरनिया के इयाद कइल आपन कुल खानदान के इष्ट, गाँव के देवता के पूजा कइल त कवनों जबून काम बा ना... बाकी के सब कथा कहानी त हमनी के जजिमनिका चलावे खातिर ह । ल इहे... बुझाता नौ दस बज गइल । ईंहा बात करे के फेर में ढेर कुबेर हो गइल । रमेसर बाबू, आगे से अइसे जन रोकब... । चलीं जै जै  सभे के....
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