Wednesday, August 27, 2025

कलकत्तवा मे पियवा बारे ललटेन

- शशि रंजन मिश्र 'सत्यकाम'


लइकाईं के सुनल एगो गाना इयाद बा। रेडियो पे सुने के मौका मिलल रहे। गायिका के नाम ठीक से इयाद नईखे कि के रहे... शायद विंध्यावासिनी देवी भा सिद्धेस्वरी देवी। बाकी गीत के बोल सुनी के इहे बुझाइल की आपन गाँव-जवार-माटी-पानी आ परिवार के छोड़ी के दूगो रोटी के जोगाड़ में लोग कहाँ-कहाँ ना गइले आ कवना तरह के काम ना कइले। गीत के दू लाइन- "कहाँ से आवे साहब बहादुर, कहाँ से आवे मेम... कलकतवा मे पिया हमरे बारे लालटेन" ओह समय के लोगन के सामाजिक स्थिति, दशा-दुर्दशा सभे के बता रहल बा। आ खाली इहे गीत ना अइसन ढेर गीत बनल जेह में ओह घरी के हालात के वर्णन रहे। चाहे भोजपुरिया क्षेत्र के लोकगीत भा सूरीनाम खातिर रवाना होत जहाज में बंधाइल मन के हूक में देस के छुटल आ परदेस के रोटी के जुगुत में भुलाइल घर-परिवार के चर्चा बा। रोटी त आपन देशवो में बा बाकी दू रोटी अधिका के लालच भा मजबूरी मे लोग परदेस के राह ध लेले ।


रोजी रोटी के खोज में परदेस के राह पकड़ल कवनों नया नइखे। कलकत्ता भारत के पहिलका व्यापार केन्द्र बनल। अंगरेजन के भारत पे कब्जा मारे के पहिलका उतजोग एहिजे से भइल। अंग्रेज़ सब के राज बढ़ोतरी के साथे प्राकृतिक सम्पदा के लूटे के एहिजा खूब मौका लउकल। आ ई खाली भारते के बात ना रहे, ढेर देसन में एहनी के इहे काम होत रहे। आपन राज्य के विस्तार में अंगरेजी हुकूमत हर तरहा के हथकंडा अपनवलस। व्यापार के नाम पे, कल कारख़ाना के नाम पे, रोजगार देवे के नाम पे हरेक देश आ ओहिजा के लोगन के खून चुसाइल। इंहा तक कि जब मॉरीशस,सूरीनाम आ फ़िजी जइसन देस .के अपना हिसाब से दुहे के खूब कोसिस भइल। प्राकृतिक सम्पदा त रहे बाकी एह संपदा के लूट के अंगरेजन के झोली में डाले खातिर ढ़ेर मजूरन के जरूरत रहे। जे खाये कम आ मालिक के कमा के जादे दे। सुरुआत में कुछ भारतीय व्यापारी , बढ़ई , लुहार जइसन कामगार लोग गइल बाकी ओहिजा जाके बंधुआ मजूर बन गइले। सन 1798 से लेके सन 1808 तक ई बंधुआ मजूरन के कबूतर बाजी चलत रहल। मई 1816 में मॉरीशस के गवर्नर के आदेस पे एहिजा से गइल बंधुआ मजूरन के आजादी त मिलल बाकी आपन देस के राह भुला गइल। ओह आदेस के बाद भारत से मजूरन के लावे पे रोक लगा दिहल गइल रहे। 1817 में ओहिजा से कुछ लोग लवट पाइल ।

ओह घरी ले अंग्रेजन के भारत पे सत्ता पे लगभग कब्जा हो गइल रहे। बाकी अभीयो एह देसन के विकास खातिर मजूर वर्ग के आउरी जरूरत रहे। मॉरीशस के गवर्नर के प्रार्थना पे ईस्ट इंडिया कंपनी एहिजा से भारतीय कैदी सब के भेजे लागल , आ इहो लोग ओहिजा बंधुआ मजूर बन गइले ।
सन 1833 में जब ब्रिटिस सरकार दासता प्रथा पे रोक लगवलस तब एह मजूरन के कमी भइल आ ओह कमी के पूरा करे खातिर अंग्रेज़ चाल चलले कंटरेक्ट आ एग्रीमेंट पे पाँच साल खाति मजूरन के भेजे के। परचार भइल कि बिदेस में नौकरी मिली। कंटरेक्ट पाँच साल खातिर रही, आवे-जाये के टिकस, पाँच रोपेया महिना के मजूरी , छौ महिना के मजूरी पहिलही मिली , मजूरी में से एक रोपेया कटाई जे पाँच साल के बाद एके साथे 60 रोपेया मिली , राशन -कपड़ा आ मकान सभे मुफुत जइसन लालच पसारल गइल। भारत के ओह समय में टुकड़ा-टुकड़ा में बंटाइल रजवाड़ा आ ओहपे निरंकुस शासन बेबस्था , रोजगार के कमी एक बड़ा मजदूर वर्ग खड़ा का देले रहे। आ इहे कारण भइल कि लोग दू रोटी आ आगे के निमन होत जिनगी के सपना देखत अंग्रेजन के कंटरैक्ट आ एग्रीमेंट पे अंगूठा लगा दिहले। जेकर कंटरैक्ट बनल उ कंट्राकी कहाइल आ जेकर एग्रीमेंट रहे उ गिरमिटिया बन गइल। चउदह गो पानी के जहाज के काल कोठरी में भरल भारतीय मजूरन के भाग के डोरी मॉरीशस के बंदरगाह पे बंधा गइल। उ जतरा कइसन रहल आ उ पाँच साल कइसे गुजरल एकर दरद सूरीनामी आ मॉरीशस के गीतन में भेंटा जाई। सरनामी गीतकार आ गायक राजमोहन जी के एक गीत के बोल देखीं -

कोई आँसू पीके रहेगे
कोई आड़े मेन सिसके है
रौई हे मायी बाबा
ठीहा मन मे धरी है
चलल जब जहजिया
कलकत्ता के किनारे
छुटल सब रिस्ता नाता
भगवान के सहारा
निकरले सरनाम के ओरे
नवा नवा तकदीर से नाता जोरे
कईसन हवा अब चली
दुई मुट्ठी एक दिन मजूरी

पेट के अगवे बुझावे खातिर लोग अंग्रेजन के सेना में भरती भइल आ अपने लोगन पे गोली दाग देलस । मंगल पांडे के कथा सभके मालूम बा, बाकी ओह विद्रोह के बादो अंग्रेजन के हुकुम बजावल आ रोटी खातिर ओहनी के गुलामी कइल ना छुटल। अब चाहे एकरा खातिर लोग विश्वो युद्ध में अपना के झोंक दिहले। अशिक्षा, लाचारी के मारले लोग कलकत्ता के राह धइले।

इहे कलकत्ता आज तक ले केतना के पेट पाल देलस। आजो कलकत्ता के बन्दरगाह, कारख़ाना, रेलवई, कोइलरी, मोहल्ला, सड़क, पार्क सभे जगहा रोजी रोटी के चिंता में हाड़ तुड़त, आपन गाँव घर के त्याग के लोगन के भीड़ लउक जाला। आ एह भीड़ में आपन भोजपुरी प्रदेश के लोग कुछ ज्यादे भेंटा जइहन । काम कवनों तरह के होखे , करे में शरम कइसन? परदेस में के देखत बा? गाँव के खेतिहर जमींदार बाबू साहेब कलकत्ता में कुलीयो गीरी कर लेस त के देखेवाला बा। आ कलकत्ता के आधुनिक रहन सहन के विदेस के दर्जा अइसहीं ना रहे। धनी बंगाली बाबू लोग के घोड़ा वाला फिटन गाड़ी त तनी कम आमदवाला खातिर हाथ रिकसा जवना में आदमी जानवर बनी के खिंचत होखे। सभे ठाट रहे। सड़क के किनारे रात में ललटेन के रोशनी खातिर तेल डाले के काम भा सड़क के धूर के पानी छिरिक के भीश्तीगीरियो के काम करे में लोग कभी कम ना बुझल। आ इहे ना जब इ लोग गाँवे लवटे त अस बखान करे कि अगर इ ना रहतें त मय कलकत्ता अन्हार रहित भा धूर मे उधिया जाइत। शायद इहे भाव एह लोग के महरारूनो के आइल होखी। तबे त बतावे में केतना गर्व के बात बा कि- "कलकत्तवा में पिया मोरे बारे ललटेन..."

एही भोजपुरिया समाज के आपन अलग पहचानो बनल। ए बी सी डी (आरा बलिया छ्परा आ देवरिया ) प्रदेश के लोग अड़ियल आ लाठी चलावे में आगे रहे। अब कोइलरी ,कल-कारख़ाना , साहेब लोग के कोठी हर जगहा पे इहे लोग के तैनाती रहे। अबहुओं पश्चिम बंगाल के आसनसोल, अंडाल के कोइलरी इलाका में इ बाबू लोग के तूती बोलेला।

आजादी के बाद देश के दशा बदलल कलकत्ता जइसन आउरी शहर के राह खुलल। मुंबई, मद्रास , दिल्ली अइसन लोग के नया ठिकाना बनल जे रोजी-रोटी के तलास में भटकट रहे। लोग नया परदेस मे नया कारीगरी नया हुनर सिखत दुनिया में आगे बढ़े लगले। शिक्षा के नाव पे अब इहे लोग समुंदर भी लांघ अइले बाकी बाकि अबकी बंधुआ मजूर ना बल्कि कुसल कारीगर बनी के। आज एही क्षेत्र के लोग हरेक क्षेत्र में आपन हुनर आ कारीगरी के लोहा मनवा रहल बा। गुलामी के सिक्कड़ से छूटते सभे के दिन दुनिया बदल गइल बा। कबो "पनिया के जहाज से पलटनीया.... " वाला गीत में आपन सोहाग के आवे के मनावत मेहरारू लोग खातिर बाजार अब घरे आ गइल। अब रोपेया पसीना के राहे आवेला त परदेस अब परदेस ना बुझाये। देश-बिदेश के दूरी अब कुछ घंटा के रह गइल बा अइसन में कवनों मेहरारू अब "रेलिया बैरन पिया के लेई जाय रे..." गीत गाके ना कोसे। बल्कि नवकी दुलहिनिया खुशी-खुशी आपन सवांग के परदेस नौकरी भेजे ले।

- शशि रंजन मिश्र 'सत्यकाम'

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