फगुआ के आगमन होतहीं प्रकृति आ मनुष्य दुनो एक साथ बउरा उठेले। खेत में पीयर सरसों के मुसकान, आम के मंजर, हवा में घुलल सुगंध, चिरई के चहचह —ई सभ जीवन के भीतर छुपल ऊर्जा के नया रूप में जगा देला।
मैथिली के महाकवि विद्यापति लिखलेन— “आइल ऋतुपति राज वसंत, धावल अलि कुल माधवी पंत।”
बसंत के राजसी छटा खाली मौसम के बदलाव ना, बलुक विज्ञान से लेके मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र आ आध्यात्मिकता तक के गहिर ताना-बाना में गूँथल बा। फगुआ–होली भारत के समेकित जीवन-अनुभव के रंग-बिरंग उत्सव ह, जेकरा में परंपरा, आनंद आ अपनापन गूँथल बा। खेत में पीयर सरसों फूले लागेला, आ मन में अइसन उमंग उठेला जइसे बरिसन बाद खुशी मिलल होखे।
आनंद आ उमंग के एह परब के पाछे ढेर कथा कहानी बा, आ हर कथा के पाछे कवनो न कवनो वैज्ञानिक सोच छुपल बा। बसंतोत्सव, होली, फगुआ भा मदनोत्सव—एह सभ के जड़ में पुरुखन के गहन अनुभव आ जीवन-दृष्टि रहल बा।
फगुआ खाली रंग-अबीर के खेल नइखे; ई देह, मन आ आत्मा तक असर करे वाला सामूहिक अनुभव ह। फागुन के आवते प्रकृति में जवन बदलाव आवेला, ओइसहीं मनुष्य के भीतर नया ऊर्जा के संचार होखे लागेला। सूखल डाल पर नया पात फूटेला, खेत में हरियाली लहराला, समाज में उमंग के स्वर गूँजे लागेला। ई उमंग धरती के माटी से लेके जिया-जंतु आ लता-बिरवाई तक सभ में पसरल रहेला।
बाकि ऊर्जा कईसनो होखे, ओकर प्रवाह नियंत्रित होखल जरूरी बा। बेलगाम ऊर्जा शारीरिक, व्यवहारिक आ सामाजिक नुकसान कर सकेला। एही से पुरखा लोग ब्रह्मचर्य जइसन अनुशासन के माध्यम से काम-ऊर्जा के संतुलित रखे के बात कहत रहे। जाड़ा में गरमी आ बल बनवले रखे खातिर विशेष खान-पान आ औषधि के प्रचलन रहल। शरीर में ऊर्जा एकट्ठा होत रहल। बाकिर इहो साँच बा कि ऊर्जा के बाँधल ना जा सके—विज्ञान कहेला कि ऊ रूप बदलत रहेला। नदी पर बाँध लगावल जाय आ ओकर प्रवाह के साधल जाव त ओहसे बिजली बनेला; आ बाँध टूटे त विनाश तक हो जाला। एही से शरीर के ऊर्जा के साध के संगोरे के साथे साथ रेचनो (निकास) जरूरी बा।
ऋतु-परिवर्तन के दृष्टि से बसंत में कफ-दोष बढ़ेला। सक्रियता, नृत्य, धूप आ रंग-खेल शरीर के स्फूर्ति देला। चरक संहिता में वर्णित ऋतुचर्या अनुसार मौसम बदले पर शोधन जरूरी बा—
“तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत्। गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत्॥२३॥”1
(वसंत ऋतु में वमन (उल्टी) आ अउरी शुद्धिकरण प्रक्रिया करे के चाहीं। भारी, खट्टा, तेलवाला आ मीठ आहार से परहेज करे के चाहीं आ दिन में ना सुते के चाहीं।)
हमनी के पुरनिया लोग बड़ा चालाक रहले। स्वास्थ्य आ शरीर सबसे बड़का धन ह एह महातम के बुझते-समझते समाज के हरेक व्यवहार में धरम-करम घुसा के समाज के एह तरहा बाँध देले कि जाने-अनजाने में लोगन के स्वास्थ्य के रक्षा होत रहल।
काम-ऊर्जा के परवाह जब रुकी त कहीं ना कहीं घात करबे करी—मन में विकार लायी, शरीर दूषित करी आ फेर समाज के। मन के विकार दूर करे खातिर समाज में तरह-तरह के बरत, त्यौहार आ उत्सव बनावल गइल। बाल्मीकि रामायण में बसंतोत्सव के चर्चा मिलेला। भविष्य पुराण में कामदेव आ रति के पूजा के उल्लेख बा। संस्कृत साहित्य में एह उत्सव के बारे में खूब लिखल गइल बा। संस्कृत नाटक ‘चारुदत्त’ आ ‘मृच्छकटिकम्’ में कामदेव के जुलूस निकाले के चर्चा बा। ‘वर्ष-क्रिया कौमुदी’ में ढोल-नगाड़ा, गाना-बजाना, कीचड़ फेंकला आ हासो-परिहास के वर्णन बा। कालिदास के ‘ऋतुसंहार’ में बसंत के वर्णन अइसन बा कि आज के समय में उ वर्णन संभवतः विवाद का विषय बन सकेला। हर्षचरित, दशकुमार चरित्र आ कुट्टनीमतम् सभ में मदनोत्सव के चर्चा बा।
अब सोचल जाय त समाज के एह तरह के उत्सव आ आयोजन के जरुरत काहे पड़ल? कारण साफ बा—काम-ऊर्जा के मनोविकार आ मनोरोगी होखे से बचावे खातिर। समाज एह उत्सव आ आयोजन के माध्यम से काम-ऊर्जा के मनोविकार आ मनोरोगी होखे से बचावे के उपाय खोजल। अश्लील हास-परिहास के छूट देके मन के विकार बाहर निकाले के उपाय कइलस। देखल जाय त पुरखा लोग एह तरह के आयोजन में अइसन-ढेर चीज समाहित कइले रहे जेकरा के साधारण लोग के समझ से बाहर रहे। आ एह तरिका के कईगो पश्चिमी वैज्ञानिक लोग पुष्टि कइले बा। उन्नीसवीं–बीसवीं शताब्दी के बीच आस्ट्रिया में सिगमंड फ्रायड2 नाम के एगो स्नायु आ मनोविज्ञान विशेषज्ञ भइलन। उनकर शोध ‘कैथार्सिस सिद्धांत’ में मन के भाव दबवला से मानसिक असंतुलन के चर्चा मिलेला। होली में हास्य, व्यंग्य, श्रृंगार, खुलापन—ई सभ मनोवैज्ञानिक रेचन के लोक-प्रक्रिया ह। जे बात सामान्य दिन में कहना मुश्किल होखे, ऊ होली में गीत बन के सहज निकलेला।
होली के समय समाज अस्थायी रूप से उन्मुक्ति के अनुमति देला, बाकिर समय-सीमा के भीतर। ई अनुशासित अल्हड़पन आ नंगई भारतीय संस्कृति के सूक्ष्म संतुलन के उदाहरण ह।
वाराणसी में होली पर खास किसिम के कवि सम्मेलन आ फाग-गायन होला। कवी लोग अंग प्रत्यंग के बखान वाला अइसन कविताई करेला कि कान में सीसा पिघल जाय—बाकिर समाज ओहिजा हुजूम लगा एह कार्यक्रम के सुनेला आ बुरा ना माने। ओइसहीं बरसाना के लट्ठमार होली में हुरियारा (ब्रज के ग्वाल-बाल जे होली खेले निकलेला) लोग ब्रज के मेहरारू लोग के सोझे अश्लील चौपाई आ छंद पढ़ेला, चुटकी लेला आ प्रेम से लट्ठ खा ले ला लोग। ई नजारा बाहरी दुनिया के बुरा लाग सकेला बाकिर लोकमानस में ई प्रेम-लीला के प्रतीक ह।
मदनोत्सव बीत जाए के बाद ई आचरण केहू ना स्वीकारे। एहि से पता चलेला कि समाज उन्मुक्ति के “काल-सीमा” तय कइले बा। ई स्वीकृति काहे? काहे कि ई काल-विशेष के छूट ह। होली के बाद ओही व्यवहार अगर दोहरावल जाव त उ सामाजिक आ कानूनी अपराध बन जाई। एहि से स्पष्ट बा कि लोकसंस्कृति में उन्मुक्तता के आजादी त दियाइल बाकि मर्यादा के चौखटो बनावल गइल बा।
होली में खाली अश्लील हास-परिहास ना, राग आ रंगो के बड़का महातम बा। आ ई खेल अबीर–गुलाल तक सीमित नइखे। ई रंग भारतीय लोकजीवन में भाव, ऊर्जा, शुद्धि आ समरसता के प्रतीक ह। जब देह पर रंग पड़ेला, त ओही घड़ी सामाजिक भेद—जाति, वर्ग, आयु—सब कुछ क्षण भर खातिर मिट जाला। रंग समानता के माध्यम बन जाला।
आयुर्वेद अनुसार वसंत ऋतु में कफ पिघले लागेला। चरक संहिता के ऋतुचर्या सिद्धांत बतावेला कि एह समय हल्का, कड़ुआ–तीख आ कसैला आहार उपयोगी होला—
“गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत्॥२३॥”
पुरान समय में होली के रंग प्राकृतिक फूल-पात से बनावल जाला—जइसे टेसू (पलाश), हल्दी, गुलाब। ई रंग त्वचा खातिर हितकारी आ वातावरण के अनुकूल रहत रहे। एह दृष्टि से रंग केवल खेल ना, बलुक ऋतु-परिवर्तन में शरीर के संतुलन के सांकेतिक अनुष्ठान रहे।
आध्यात्मिक अर्थ में हरेक रंग के अलग माने बा। ब्रज परंपरा में होली राधा–कृष्ण के प्रेम-लीला से जुड़ल बा। कृष्ण के नीला रंग अनंत आ गहराई के प्रतीक ह, जबकि राधा के लालिमा प्रेम आ समर्पण के। पीयर रंग ज्ञान आ बसंत के प्रतीक ह, आ हरियर नया जीवन के। जब लोग एक-दूसरा पर रंग डालेला, त उ एगो आध्यात्मिक समरसता के अनुभव होला—“अपने ही रंग में रंग ले कान्हा।”
होली में रंग लगावत समय हँसी, शोरगुल, गीत, नाच—ई सब मिलके मानसिक रेचन (Catharsis) पैदा करेला। रंग के छुअन से देह में स्पर्श-संवेदना जागेला। तेज रंग आँख के उत्तेजित करेला। सामूहिक हँसी तनाव घटावेला, आ एह तरह होली सामाजिक मनोचिकित्सा जइसन काम करेला। एह दिन “बुरा न मानो होली है” केवल कहावत ना, बलुक सामाजिक अनुबंध ह—कि आज के दिन मन के मैल धो डालीं।
रंग के छींटा एक तरह से देखल जाव त माफी आ छमा के परतोख ह—पुरान मनमेटाव आ रंजिश के धो देवे के संकेत। होली के रंग देह पर चढ़ेला, फेर मन में उतर जाला। रंग से राग पैदा होला, राग से उमंग, उमंग से थकान, आ अंत में शांति होला। होली के रंग जीवन के ओह रूप के उजागर करेला कि एहिजा सब कुछ छणिक बा—आज रंग बा, काल धोआ जाई; बाकिर अनुभव के छाप भीतर रह जाई।
अब जब रंग के उमंग भइल त होली में चंग, मृदंग आ ढोलक के थाप उठबे करी। फाग के राग में घुल के लोग विराग तक पहुँच जाला। फाग के बाद चइत के तान में विराग से विरह तक डूब जाला। कहल जाला-फाल्गुन बसंत के लड़कपन ह, त चईत ओकर बुढ़ारी। दीपचंदी आ कहरवा के मेल प दोगुन-चौगुन राग के फेंटत जब झाल, ढोलक, ताली आ सब कंठ एक हो जाय त शरीर के रोआं-रोआं नाच उठेला। ई स्वर-लय ध्यान के रूप ले लेला।
“बँगला में उडेला अबीर… आहो लाल बँगला में उडेला अबीर…”
एह गीतन में “लाल”, “हा”, “हू” जइसन ध्वनि खूब प्रयोग होला। “हा” आ “हू” नाभि-केन्द्र (मणिपुर चक्र) के आंदोलित करेले। मंडली में ढोलकिया ध्यान के केंद्र बन जाला, आ भीतर के वासना, क्रोध, आक्रोश लय-ताल में ढल के संगीत बन जाला।3 भारतीय पुराण4 परंपरा में ‘हाहा’ आ ‘हूहू’ दुगो यक्ष के उल्लेख मिलेला, जे गीत-संगीत में निपुण रहलें। लोकविश्वास बा कि फगुआ आ चैता के गायन में जब गवैया “हा…” आ “हू…” के लंबा आलाप लेला, त उ ओही यक्ष परंपरा के ध्वनि के गूँज होला। “हा” के विस्तार छाती से निकलेला, “हू” के कंपन नाभि आ कंठ में गूँजे ला। ई ध्वनि वातावरण के झंकृत कर देला। एह नाद में देह के ऊर्जा जागेला, मन के आवेग बह जाला, आ चेतना ऊपर उठे लागेला। ढोलक के थाप, झांझ के टंकार, “हा-हू” के आलाप—ई सब मिलके सामूहिक ऊर्जा के विस्फोट पैदा करेला। ई विस्फोट विध्वंस ना, बलुक शोधन ह।
ओशो के नाद-दर्शन5 में कहल गइल बा कि अनहद नाद (मन के अन्दर के आवाज) सुने से पहिले बाहरी शोर के खतम (विसर्जन) जरूरी बा। उनकर ध्यान-पद्धति में तेज संगीत, उन्मुक्त नृत्य, जोरदार श्वास-प्रश्वास आ फेर अचानक मौन—ई क्रम कई बेर दोहरावल जाला। ई मानसिक “रेचन” (Catharsis) के प्रक्रिया ह, जेकरा के ओशो ध्यान के जरुरी अंग बनवले।
पूर्वांचल के धमाल आ फगुओ अइसने सामूहिक साधना ह-पहिले शोर, फेर थकान, फेर मौन। फाग के राग दोगुन चौगुन होते उन्हे पर पहुंचेला आ एकेबार ‘हाँ’ के आवाज के साथ ले तुड़ दियाला। क्रम चालत रहेला आ इहे यात्रा शोर से नाद तक, देह से देवत्व तक के ह।
होली अस्थायी समानता के परब ह। जाति, वर्ग, पद के भेद कुछ समय खातिर धुँधला पड़ जाला। “सब रंग में एक” के भाव सामाजिक तनाव घटावेला। अइसन उत्सव समाज खातिर सुरक्षा-भाल्भ (safety valve) जइसन काम करेले-दबाव बाहर निकलेला, संरचना सुरक्षित रहेला।
फगुआ के अश्लील कह के नकारल उचित ना होई। लोक-संस्कृति के खुलापन विकृति ना, प्रकृति के सहज विस्तार ह। जब ऊर्जा मर्यादा में अभिव्यक्त हो जाला, त समाज स्वस्थ रहेला। एह तरह फगुआ–होली शारीरिक सक्रियता, मानसिक रेचन, सामाजिक समरसता आ आध्यात्मिक नवजीवन के समन्वित उत्सव ह। ई हमनी के सिखावेला कि शुद्धि खाली नियम से ना, बलुक हँसी-खुशी, अल्हड़पन, राग-रंग आ उमंग के प्रवाहो से हो सकेला। फगुआ सिखावेला कि दमन से ना बलुक संतुलित अभिव्यक्ति से समाज स्वस्थ रहेला।
अंत में अतने कहे के बा कि होली मन के भीतर के मलिनता जला के चेतना के उजास देवे वाला परब ह-जहाँ हर साल आदमी अपने के अपने से भेंट करावेला, राग-रंग में भींजेला आ फेर साल भर खातिर नया हो जाला।
सन्दर्भ :
¹ चरक संहिता, सूत्रस्थान, तस्यशितीय अध्याय, श्लोक 23 — “तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत्…”
² Sigmund Freud, Studies on Hysteria (1895), कैथार्सिस सिद्धांत।
³ मगध कि रहस्यावृति साधनाएं – डॉ रवीन्द्र कुमार पाठक
⁴ हाहा–हूहू यक्ष उल्लेख — महाभारत एवं पुराण परंपरा (गंधर्व/यक्ष संदर्भ)।
⁵ Osho, Dynamic Meditation Discourses, नाद व कैथार्सिस चरण।