Saturday, January 28, 2017

सकरात के बात



 (ई रचना भोजपुरी संगम के जनवरी -२०१७  अंक में छपल बा )
गोड़ लागीं ए बाबा !कउड़ सेंकत रमेसर हाँक मरले । पंडित घरभरन मिसिर भोरे भोरे मुँह में दतुअन कचरत आ दायाँ हाथ में लोटा हिलावत चलल आवत रहन । दतुअन होठ आ दाँत के मिलल जुलल पगुरांव प अपने आप कब्बो दायाँ गाल त कब्बो बायाँ गाल फेरात रहे । थूक आवे त दाँत में दतुअन  के दबा के आगे के दू दाँत के फांक मुंहे पिच्च से थूक देस । कान पर जनेऊ के तीन फेरा देवे में स्वेटर आ गंजी एक ओरे से उचकत रहे ।
पंडित घरभरन मिसिरगाँव देहात में पुजाले । सतनराएन के कथा से लेके सप्तसती के जबानी घोंट के पी लेले बाड़ें । शुम्भ-निशुम्भ आ कुम्भ ना जाने कई तरह के बियाह के मंतर जानेलन । अइसन मनई से हर कोई आस राखेला कि ओकर समस्या के निदान त मिलिये जाई । अब उ भले पतरा देख के बतावस भा जतरा देख के... लोगवा त पुछबे करी । सांझे पुछी, बिहाने पुछी ... आते पुछी त जाते पुछी, कब्बो नहाते त कब्बो मर मैदान जातो पुछी । त बाबा घरभरन से काहे ना पुछी । लोग पुछल... लोग ??? अरे ना रमेसर पुछले हाँ । पुछले हाँ... अबहीं कहाँ... अबहीं त पुछे के सुरता बनवले हाँ ... पांवलग्गी आ उहो दूरे से । मुँहे से उचरले हाँ । आसीरबादो मिलल ह । मुँह के बायाँ ओर के दाँत से दतुअन दबा के... अपना से बाएँ तीन फर्लांग दूर पिच्च से थूकला के बाद ।  “...जै जै रमेसर बाबू । आबाद रहीं.... अहा हा ! आग तापत बानी !? इहो सिद्ध लोग के काम ह - धुनी रमावल आ पंचाग्नि तापल । रवा त पहिलहूँ के सिद्ध हईं । ना आगे नाथ ना पीछे पगहा... राउरे मरजाद बा सउंसे जगहा । कहीं... कुछ कहल चाहत बानी का ??”
ना ए बाबा, कहे के का बा... देवता मनई के भोरे-भोरे दर्शन भइलो त पुन्न ह ।
अहा हा हा... जीहीं, जीहीं । खूब कहनी... बाकी ए रमेसर बाबू हई मर मैदान के रास्ता रोक के दर्शन करे के ममिला गड़बड़ बुझाता ।
हा हा हा ... बाबा के बात । अब का कहीं ए बाबा... रवा अइसे त भेंटाईं ना । कब्बो फलनवा जजीमान किंहा छठीहार सतईसा त कब्बो चिलनवा जजीमान किंहा सराध । राउर त गोड़ में चकरी लागल रहेला । अब रवा से भेंट करे खातिर इहे नीक राह लउकल ह । जानते बानी गाँव देहात के लोग दिन में भले मत लउके बाकी साँझ बिहान सीवान ओरे भेंटा जाई । अब घर से नजदीक जवन सीवान ओनही पठान ।
त आज हमार सीवान छेंकाइल बा । खूब कहनी बाबू साहेब । रुकीं... अब हेतना उतजोग कइनी त राउरो समस्या सुनिए लिहल जाव । दू मिनट आउरी दम धरीं... आईं हई इनरा पर से तनी दू बाल्टी पानी के इंतजाम करीं... हाथ मलीं आ मुँह धोईं । मर मैदान के मुँहे त भगवान के नामो ना लेवे के... रवा कहीं जतरा पतरा के बात करब त दिक्कते होई ।
रमेसर उठ के दू बाल्टी पानी के बेवस्था कइलन ।  जै जै.. बड़ा गरम पानी बा एह इनरा के ।
नहइबो करब का ए बाबा ?”
अरे ना ना... बड़ी जाड़ बा हो... घरही नहाइब । अबही त मंतर स्नाने से काम चली... दू दिन बाद सकरात आवता । बनारस के प्रस्थान होई, ओहिजे गंगा जी में भर जाड़ के स्नान के फल लेहब ।
सकरात गुने त हमहूँ अइनी हाँ... अब रवा से का छुपल बा । सकरात पर कुछ शंका समाधान त रवे नू कर सकीले ।
लीं...भल कहनी । सकरात पर पुछब आ उहो सूखे सूखे । रवा सोझे हाथ मुँह धोके बइठल बानी आ खाये पीएवाला परब पर बतकही कइल चाहत बानी .... ई ना होई । मंगाईं पाव भर चूड़ा, गुड़ आ चार पाँच गो लाई-तिलवा तब नू गेयान के गठरी खुली ।
ए बबुआ दुर्गेश, तनी हाल दे घरे धाव.... माई से सेर भर चूड़ा, गुड़ लाई तिलवा मांग के लाव... बाबा के सीधा देवे के बा । भाग के जा आ धउड़ के आव त” –रमेसर आपन लईका के कहलें । ए बाबा रवो शुरू करीं, पनपियाव त आवते बा...
हं हं काहे ना... तनी जगह बनायीं । जाड़ में कउड़ के आग से बड़ सुख का होई... हाँ त रमेसर बाबू , का पुछे के रहल ह ?”
बाबा, एगो शंका रहल ह, सकरात में दहीये-चूड़ा आ खिचड़ी काहे ?”
जै जै... बड़ा नीक पुछनी । माने कोतवाल से कोतवाली के हाल पुछल जाला । सब भेद खुल जाई त हमरा अगिला बेर से ना चूड़ा भेंटाई ना लाई तिलवा के नेवान होई ।
हा हा हा... रवो नू , बतिया के कहाँ से कहाँ ले जाइले । शंका एह से आइल ह कि केहू एकरा के खिचड़ी कहेला, कहीं सकरात, कहीं पोंगल आ सब जगहा लगभग एके लेखा विध वेव्हार तिल गुड़ के... खिचड़ी के... इहे बड़ा कन्फूजन हो गइल कि ई काहे आ कइसे... आ अइसे त कबसे ?”
लीं... राउर शंका त लमहर राह लेता । एगो पुछब त दोसर निकली । दोसर त तिसर ... रुकीं बतावत बानी... लीं हई देखीं पनपियाव आ गइल । रवो सभे लीहीं । अब बात कुछ गंभीर होई त मुँह चलत रहे ।
हं त रवा सभे जानते होखब हमनी के पुरनिया के... बड़का वैज्ञानिक सोच रहे लोग के । रीत रिवाज आ विध वेव्हार से समाज के अस बांध के रखलस कि देह दशा तनिको ना बावें होई ना दहीने । जेतना लोक परब बनावल गइल उ उहे लोग के देन ह । प्रकृति, समय आ भौगोलिक स्थिति के सटीक विश्लेषण जेतना पुरुखा लोग कह गइल बा ओतना आज के वैज्ञानिको जुग में अंदाज लगावल संभव नईखे । माटी, पानी, हवा, आकास, धूप, छाँव जईसन प्राकृतिक चीजो वैज्ञानिक यंत्र रहे ।
हाँबतिया त साँच क़हत बानी... का, कब आ कइसे के वेव्हार ई त सांचहूँ बतावल बा... त फेर आगे कहीं ।
देख ! भारत के भौगोलिक स्थित एक नइखे । समशीतोष्ण  प्रदेश कहाला । कहीं कंपकपात जाड़ त कहीं चिलचिलात गरमी । कहीं लहलहात खेत, कहीं जंगल त कहीं पहाड़ आ पठार । कुछ प्रदेश में नदी नाला आहर पोखर के जाल त कहीं सालों भर सुखाड़ । अब अईसन परिस्थिति में कवनो लोकपरब मनावे के तरीका आ समय बिलकुल अलग होखबे करी ।  पूरा भारत में जगह आ सुविधा के अनुसार लोक-परब के मनावे के विधि आ समय अलग बा । बाकी सभे के पाछे एके उद्देश्य इहे बा  कि मय समाज एह परब में गुंथा जाव । ना बड़-ना छोट, ना छूत- ना अछूत, एह लोक-परब में सब भेव मिट जाव ।  लोक परब के अबूझ संसार के रीति रिवाज आ विधि के पाछे जवन पुरुखा पुरनिया के वैज्ञानिक सोच छुपल बा उ धेयान देवे योग्य बा ।
साँच बात”- रमेसर के साथे ओहिजा बइठल दू जाना हुंकारी  भरले ।
जाड़ के मौसम में शरीर के ज्यादा ऊर्जा के जरुरत पड़ेला । देखते बाड़ऽ कि बगैर एह आग के तापले देह के हाड़ जरनेटर लेखा हिलत बा । ठंढा जगहा में  लोग खूब माँस मछरी खाला कि देह गरम रहो । हमनी के का मर मसाल, मकरध्वज आ चवनप्रास । एतना तक त ठीक बा कि खाए पिये से गर्मी आ जाला बाकी एकरा साथे महनतों के जरूरत पड़ेला । बाकी जाड़ा के मौसम में लोग ऊर्जा के अभाव में आलस्य के कोरा में बइठल रहेले । अब बदलत प्रकृति के अनुसार हरेक जीव जन्तु, पेड़ पौधा अपना के ढाल लेला आ प्रकृति के साथ समरस हो जाला बाकि मनुष्य के आपन प्रकृति बा । समस्त संसार पे विजय के चाह राखेवाला मनुष्य अपना के प्रकृति के साथ ना बदलेला आ आपन नुकसान करेला ।
हाँ बाबाबतिया ठीक कहत बानी । हमरो मन करत रहता कि खरिहान में खटहुल में जाके पुअरा के गरम बिछावना पे दिन भर चद्दर तान के सुतीं । बाकी जानते बानी गाय गरु , खेती बाड़ी के काम छोड़ के नींद लागो । चवनपरास से इयाद पड़ल ... अबकी सुदेशन वैद का जाने चवनपरास बनवलन कि ना... पिछला साल त बाजार से लेनी त बुझात रहे कि सकरकंद के हलुआ होखे । सुदेशन वैद के बनावल एक चमच खाये त देह पर से सुटर शाल सब उतार जाय...”- मड़ई जादो कउड़ के आग उटकेरत कहलन ।
अरे मरदे दम धरऽ... तहरा के सुनीं कि बाबा के”- रमेसर खिसियइलन । हाँ त रवा कहत रहीं बाबा... बड़ा नीक जानकारी बा
अरे ना हो, मड़ई ठीके इयाद करइलन ह सुदेशन वैद के... बड़ा विद्वान आदमी उहो... ढेर बात उनको से होला । उहे कहत रहन कि वैदई में मानल जाला कि शरीर के छलावे में तीन चीज के ईंधन काम करेला । आ एह तीनों के तनिका से हेरफेर से शरीर मे रोग बेआधी हो जाला । वैद जी शरीर में वात (वायु) , पित्त आ कफ रहेला आ एकरे के त्रिदोष कहत रहन । इहो बतावत रहन दोष के प्रकृति के अनुसार ही खानपान आ उपचार में बदलाव करल जाला । माने जइसन देवता ओइसन पूजा । अब सुनऽ एह सकरात के हाल... उहे वैद जी के भेद खोलल ह । आसीन (आश्विन), कार्तिक महिना में पित्त के प्रकोप ज्यादा होला । शरीर के भीतरियो आग बा जावना के पित्त कहाला आ एकर प्रकृति अमलीय ह, जे खाना पचावे के काम में आवेला । बाकी जब एह आग के दंवक अपना मान से तेज हो जाला  त आंत के नुकसान पहुंचावे ला । पित्त के प्रकोप से शरीर में जलन, पेटदर्द, उल्टी, पेट के दोसरो रोग जनम लेला । आ एह पित्त के प्रकोप तब आउरी बढ़ जाला जब ठंढ भगावे के फेरा में लोग अनाप-सनाप चीज खायेला । तेज मसाला, गरम पेय, शराब आ मांसाहारो एक बड़ा कारण बा पित्त प्रकोप के । आ एह तरह के खान पान के प्रयोग बहुत पहिले से कर रहल बा । अब एह शारीरिक पित्त के शांति पूस आ माघ के सकरात के समय करल जाला ।
वाह बाबा, हम त जानत रहीं कि रवा खाली मंतरे जानीले... रवा त हेतना निमन से वैदयी के बातो बतावत बानी ।
अरे इ सब अनुभव के बात ह । लोग से जाने सीखे ले मिलेला । त कहत रहीं कि मकर सकरात के दिन नया धान के चूड़ा (चीवड़ा, पोहा), दही के साथे नया फसल के गुड़, तिल के खाये के प्रथा सगरे बा । अब सुनऽ आउरी विज्ञान के बात । पुरनिया सब जवन खोज कइले नयका लोग अब खोजता । सोचऽ घर के नाली जाम होला त का कइल जाला?”
फराठी भा लग्गी से गाद आ कचड़ा के निकालल जाला भा आगे ठेल दियाला कि पाछे के पानी निकल जाव ।”-रमेसर कहले ।
चाबस बाबू साहेब... हम एही से नू कहिला कि रवा सिद्ध हईं । बात के कोर पकड़ के सीधे जड़ तक पहुंचीले । इहे चीज त पेटवो खातिर कइल जाला । अब पेट में लग्गी ना नू कोंचब.... त एकरा खातिर अइसन वेवस्था कइल गइल कि मय जमा खर्चा बिना हिंग फिटकिरी के निकल जाव । हमनी के खेतिहर समाज, एही प्रकृति से उपाय लेलस । हई चूड़ा के गुण जानते बाड़... पाव भर खाइब त कुछ देर में सेर भर खइला लेखा लागि । पानी मिली त पातर सुखल चूड़ा फूल के आपन औकात से बेसी हो जाला । त पेट के आंत में सटल जेतना गंदा पदारथ बा ओकरा के चूड़ा सोख ली । दही के गुण त जानते बाड़ कि पेट के निरोग रखेला । आ साथे साथ गुड़ पेट के अग्नि के ताप के दूर करेला ।
वाह, ई त सेतिहा के लाख रोपेया बराबर बात बतवनी । बाकी तिल-गुड़ , तिलकुट लाई काहे ?”
अरे ई त हमरो न मालूम रहे । वैद जी कहत रहन कि भुंजल तिल आ गुड़ से कब्ज ठीक हो जाला । अब पुरखा पुरनिया लोग ई जानत होई तबे सकरात के पेट सफाई के पूरा इंतजाम एके साथे कर देले रहे ।
सही कहत बानी बाबा... पुरनिया लोग हमनी से जादे विद्वान रहे । हरेक चीज के उपाय सेतिहे आ सहजे बता देलस लोग...
अरे आगे सुनऽ ... दिन में चूड़ा-दही से पेट के जब मल के निकास हो गइल  त रात के खिचड़ी... कि जड़ी पच जाये आ पेट के आरामों मिल जाये ।
ए बाबा  राउर बहुत बहुत धन्यवाद एह शंका दूर करे खातिर । बाकी एगो आउर सहजे प्रश्न उठट बा कि खाये पिये से त बुझा गइल कि शरीर  के लाभ मिली बाकी हई तिलंगी (पतंग) काहे  उड़ावल जाला ?”
हा हा हा... कहनि हाँ नू कि आदमी के स्वभाव ह आराम करे के... पेट भइल भारी त अब का लदब व्यापारी । माने अघाइल बैला के हौ ... पेट भरल ना कि देह हाथ सोझ करे आ आराम के फिकीर । त पतंगबाजी से माघ के गुनगुना घाम देह में लागो आ खेलत कूदते चूड़ा के भारीपन दूर हो जाय त का हरज ।
वाह, माने आम के आम गुठली के दाम वाला बात
अरे अतने ना, आउर सुनऽ...  एह पतंगबाजी में योग साधना घुसल बा । भारतीय साधना पद्धति में बिन्दु साधना एगो महत्वपूर्ण अंग ह । एह साधना में एक बिन्दु पे धेयान केन्द्रित कराल जाला । आँख, बुद्धि तेज करे के सबसे बढ़िया उपाय लईकन के पतंगबाजी ह । पतंग के हरेक लोच आ कलाबाजी के साथ मन आ शरीर के मेल साधना के अनूठा रूप ह । सकरात के दिन के चूड़ा दही के भारी भोजन के खेल कूद में पाच जाय आ साथे एक साधना हो जाये , एही सोच के साथे सकरात के पतंगबाजी जोड़ दियाईल ।
बाबा त एह में पूजा पाठ कवना काम के ?”
लऽ... लगल नू आपन बुद्धि लगावे । हम कहत रहीं  नू कि भेद जानते हमार दान दक्षिणा पर आफत हो जाई आ तू अबहियें ओकर झलक देखावे लगल ।
ना बाबा, राउर सीधा-पानी त चलते रही, बस इहे अंतिम शंका रहल ह । जब एतना बता देनी त इहों बता दीं ।

अच्छा त इहों सुन ल... सकरात खाली लोकपरब ना ह । ई पुरखन के वैज्ञानिक सोच से उपजल, मौसम के संधिकाल में शरीर के शोधे के परब ह । खात पियत खेलत कुदत एगो बड़ स्वास्थ्य रक्षा के उतजोग हो जाये आ एकरा में हिंग ना फिटकरी खाली आनंदे बरसे त इहे नू लोकपरब के असली माने कहाई । सुरूज साक्षात ऊर्जा के प्रतीक हवें, अब राशि ग्रहचाल से उनकर स्थिति जवन होखे, बाकी एह परब में उनको के पूजा करल जाला । एह घरी सब नया अन्न आवेला त हरेक खेतिहर के ई कर्तव्य होला कि एकरा खातिर प्रकृतियो के धन्यवाद देवे । अब एह में प्रकृति के इयाद कइल, पुरखा पुरनिया के इयाद कइल आपन कुल खानदान के इष्ट, गाँव के देवता के पूजा कइल त कवनों जबून काम बा ना... बाकी के सब कथा कहानी त हमनी के जजिमनिका चलावे खातिर ह । ल इहे... बुझाता नौ दस बज गइल । ईंहा बात करे के फेर में ढेर कुबेर हो गइल । रमेसर बाबू, आगे से अइसे जन रोकब... । चलीं जै जै  सभे के....
*****

Wednesday, May 18, 2016

छपास कवि




मंचीय कवि ,
हईं छपास
ना छपे त
रहीं उदास 

एकर ओकर
जेकर-तेकर,
छपत खाली
छोड़के हमर 

अब ई लाज
कईसे पचाईं ,
जवन छपल बा
उहे गोहरायीं 

लाइक कमेंट के
माला चादर ,
टैगवालन से
स्वीकृत बा सादर 

~शशि रंजन मिश्र

Wednesday, April 13, 2016

सतुआन- लोकसंस्कृति के परब


स्कूली पढाई के बेर सामाजिक विषय में सभे पढले बा कि “आदमी (मनुष्य) एगो सामाजिक प्राणी ह” । अब एह वाक्य में दूगो महत्वपूर्ण शब्द बा- पहिला आदमी भा मनुष्य आ दुसरका समाज । आदमी आ समाज एक दुसरा के पूरक (पूरा करेवाला) ह । आदमी बा त समाज बा आ समाज बा तबे आदमीयो बा । आदिकाल से जब आदमी जंगल में रहत रहे त आपन सुरक्षा खातिर समूह में रहे लागल । एहिजे से परिवार, समाज आ समुदाय के विकास भईल । समूह आ झुण्ड में रहल आदिकाल से प्राथमिकता रहे । समूह में एक साथ रहत आ एक दूसरा के मदद करत समाज विकास के राह पकड़ ले ला । आपन आ समाज के आवश्यकता के पूर्ती एक दूसरा के सहभागिता से पूरा हो जात रहे । समाज के हरेक वर्ग खातिर विशेष ध्यान दियात रहे । काज-करम के आधार पे समाज बंटायिल रहे , बाकी धीरे-धीरे इ भेद धर्म आ छुआछूत से अंटा गईल । बाद में मनुवादी वर्ण व्यवस्था के दुरूपयोग खूब भईल । बाकी एह दुरूपयोग के बचावे खातिर भी ढेर उपाय कईल गईल रहल ह । एक उपाय रहल ह लोक-संस्कृति के परब मनावे के । एह लोक-परब के मनावे के पाछे समाज के हरेक वर्ग के एक सुता में बान्हे के कोशिश रहे । पूरा भारत में जगह आ सुविधा के अनुसार लोक-परब के मनावे के विधि आ समय अलग बा । बाकी सभे के पाछे एके उद्देश्य इहे बा  कि मय समाज एह परब में गुंथा जाव । ना बड़-ना छोट, ना छूत- ना अछूत, एह लोक-परब में सब भेद मिट जाव ।   


धरम के बाजारू चश्मा हटा के देखीं त जेतना भी परब त्यौहार बा , सब लोक-परब ह । सकरात, छठ, होली दिवाली, नवरात्र , सतुआन आ ना जाने केतना परब । सभे परब सामाजिक समरसता बनावे खातिर कवन विधि अपनवले, इ ध्यान देवे वाला बात बा । उदाहरण में एहिजा सतुआन पे चर्चा करब । बाकी परब में रउआ सुधि पाठक लोग अंदाज लगा लीं ।

सतुआन भा सतुआ सकरात (संक्रांति) त नामे से बुझा जाला कि एही दिन के सत्तूआ के सम्बन्ध बा । बाकी काहे , चर्चा आगे बा । बिहार (संगठित)- पूर्वी उत्तर प्रदेश में जहाँ सतुआन मनावल जाला ओही दिन बंगाल में में “पैला (पीला) बैसाख” परब आ पंजाब में बैशाखी मनावल जाला । बंगाल आ पंजाब के नया साल एही दिन से शुरू होला । दक्खिन भारत में इ लोक-परब के नाम बिशु त आसाम में बिहू कहल जाला । कमोबेश भारत के हरेक जगहा इ लोक-परब मनावल जाला । सतुआन, सकरात, मेष संक्रांति, वैशाखी, पैला बैशाख, बिशु भा बिहू सभे के मनवला के पाछे एके कारण बा – नया फसल के अईला के आनंद मनावल आ आपन इष्ट देवता के धन्यवाद देवे के ।

सतुआन हरेक साल 13-14 अप्रैल के मनावल जाला । खगोल शास्त्र आ अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार 21 मार्च के दिन-रात बराबर होला । ओकरा बाद दिन आ रात के अनुपात बदल जाला । दिन बड़ आ रात छोट होखे लागी ।  इ समय ह नया अन्न के आवे के । दलहन फसल के कटनी एही समय शुरू होला । गेहूं के हिंदी में “कनक” कहल जाला आ “कनक” के दोसरका अर्थ सोना भी होला । पियर दह-दह सोना के रंग में रंगायिल खेत के देख के किसान के मन पोरसा भर उछ्लत रहेला । सरसों, गेहूं के पौध गोटाइल बाली के भार से झुकल जात बा । माने धरती के देह से निकलल आ धरती के खून से पोसाइल आपन समृद्धि के धरती के ही समर्पित करत “त्वदीयं वस्तु देवर्षे, तुभ्यमेव समर्पये ” ।  
किसान धरती के सेवा करेले आ बदला में धरती आपन छाती फाड़ के फसल देवेली । एकर आनंद उहे जे माई आ बेटा के बीच होला । किसान माई धरती के धन्यवाद देवे खातिर वैशाख के एह विशेष दिन के उत्सव के रूप में मनावेले ।  एह दिन नया अन्न खाए के महातम ह ।  सतुआन में भी इहे होला बाकी तनिक  पुरनिया लोगन के वैज्ञानिक सोच आ लोक संस्कृति के बचावे के जेतना विध एह सतुआन में बा, उ दोसर परब में ना लउके ।

सतुआन के दिन सत्तुआ (नया अनाज विशेष चना-जौ के भूंज के चूरन कईल) के साथे आम के टिकोढा, गुर, दूध खाए आ नया घईला के पानी पिए के महातम बनवल गईल । आ इहे कुल्हि दान धरम करे के । सतुआन में सत्तुआ खाए के कहल जाला एकरा पाछे कुछ वैज्ञानिक सोच रहल ह । नया अनाज में गर्मी होला, नया अन्न के सेवन से कुछ शारीरिक प्रकोप भी होला । अनाज के इ गर्मी पेट में भी गरमी करेला । वायु विकार बढे के इ बड़का कारण ह । कबो कबो नया अन्न खयिला से पेट भी झरे लागेला , जेकरा के हमनी कीन्हा चईतार लागल कहाला । भुजल अन्न के चूरन पेट में वायु के दोष दूर करेला । कच्चा आम में अमल के गुण होला जे वायु विकार के दूर करेला आ पाचन शक्ति के बढ़ावेला । एह समय मौसम के बदलाव होला एह से शारीर में कफ भी उत्पात मचावेला एह से गुर भी शामिल कर लेवल गईल । साथ में घईला के ठंढा पानी माने शारीरिक गरमी जे नया अनाज से हो रहल बा ओकरा के शांत करे के । ओइसे एक दू बरखा के बाद जब वातावरण ठंढाला तब नया अनाज के गर्मी भी शांत हो जाला । बाकी लोक-परब के बहाने तन-मन के इलाज भी हो जाए आ उत्सव हो जाए त का हरज बा ! अब एतने उत्जोग में मय समाज के कईसे बंधाईल इ पुरुखा-पुरनियन के सोच रहे ।
लोक-परब के माने इ जेह में समाज के हरेक वर्ग के कुछ ना कुछ योगदान होखे । ए ही परब त्यौहार में सभे के आमदनी आ उत्सव के जरिया बने एकर ख़ास धेयान देवल गईल । आज के बिगड़ल परिभाषा में जजिमान आ पुरोहित के माने उहे जे पूजा पाठ करावे आ दान दक्षिणा लेवे आ देवे । दान देवेवाला जजिमान आ लेवेवाला पुरोहित । बाकी इ परिभाषा के मूल रूप में इ ना रहे । समाज में हरेक उ जजिमान रहे जे केहू से कवनो काम लेत रहे । दोसरका तरह से कहीं त “सेवा देवेवाला” आ “ सेवा लेवेवाला” एक दूसरा के जजिमान रहलन । आ इ सब कर्म प्रधान रहे । हज्जाम के सेवा देवे वालन के जेतना ग्राहक उ ओकर जजिमान , एही तरह समाज के चर्मकार, कुम्हार, मेहतर जईसन सेवावालन के भी जजिमान रहन । एतने ना सामाजिकता में जजिमान के क्रय बिक्री भी होत रहे । बंटाई भी होत रहे । इन्हा तक कि दान दहेज़ में भी जजिमनिका दियात रहे । माने दहेज़ लेवेवाला अब जजिमान के सेवाकर्ता हो जाई  आ एह से जेतना भी कमाई होई उ ओकर हो जाई । इ एगो समाजिकता के रूप रहे जेह में एक दोसरा के सहारा देके आगे बढ़ावे के धेयान राखल गईल रहे  ।  
सतुआन खाली किसान के परब ना ह, घुन्सारी झोंकेवाला, अनाज पिसेवाला, माली  आ कुम्हार सभे के परब ह । नया अनाज त किसान किंहा आईल, घुन्सारिवाला त खेती ना करे बाकी जब उ अनाज भुंजे के सेवा दी त कुछ अनाज ओकरो भेंटाई । माली आम के टिकोढा दी त अनाज ओकरो भेंटाई । गुर खातिर बनिया के आ नया घईला देके कोंहार के भी कुछ नया अनाज मिली । अब दान-धरम कई के गरीब-गुरुबा आ ब्राहमण के भी नया अनाज दियाई । माने मय समाज केहू तरे नया अन्न में आपन आपन हिस्सेदारी राखेला । आ जब इ नया अन्न घर में आईल त उपरवाला, आ इष्ट के धन्यवाद देत परब त मनबे करी ।
लोक-परब के इहे माने ह जेह में सब के सहभागिता आ सहभोजिता रहे । एह परब मे कवनों छुआछुत ना मानल जाए । अगर गौर करब त छठ जईसन लोक-परब में जे समाज मे सबसे अछूत रहल ओकरे बीनल दउरा आ सूप जादे पबितर । आ कुल एही तरह के बात बाकी लोक-परब मे भी बा । बस आपन नजरिया बदल के देखब त आपन पुरखन के सोंच पे गर्व होई ।
बाकी आज के समाज के रूप बदल गईल बा । आज के आदमी सामाजिक ना होके  व्यक्तिवादी हो गईल बा । संयुक्त परिवार जे समाज के छोट रूप रहे विलुप्त हो रहल बा आ साथ में लोगन के सामाजिकता के धारणा भी ।  बदलत परिस्थिति में समाज के कर्म क्षेत्र भी बदल गईल आ साथ में आवश्यकता भी । बाजारवाद हर जगहा आ गईल । शौपिंग मौल आ जनरल स्टोर सेवाकर्ता आ हमनी के उनके जजिमान । रोपेया के भावे परब त्यौहार मनायीं । अईसन बदलत वातावरण में लोक-परब मनावल खाली मन के बह्लावल ही कहाई ।  


(इ लेख भोजपुरी के लोकप्रिय ई-पत्रिका आखर के अप्रैल 2015 अंक में छप चुकल बा )